Sunday, 20 February 2011

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Tuesday, 15 February 2011

टाइम पत्रिका ने दुनिया के 10 सबसे बड़े सेक्सबाज नेताओं की सूची तैयार की है, जिसमें सातवें स्थान पर क्लिंटन को रखा गया है।



नई दिल्ली, मंगलवार, 15 फरवरी 2011( 17:05 IST )
टाइम पत्रिका' की एक नई सूची से अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन और एक समय में उनकी महिला मित्र रही मोनिका लेविंस्की के चर्चे एक बार खास ओ आम की जबान पर आ सकते हैं। टाइम पत्रिका ने दुनिया के 10 सबसे बड़े सेक्सबाज नेताओं की सूची तैयार की है, जिसमें सातवें स्थान पर क्लिंटन को रखा गया है।

गौर करने वाली बात यह है कि आए दिन महिलाओं के साथ अपने संबंधों को लेकर सुखिर्यों में बने रहने वाले इटली के प्रधानमंत्री सिल्वियो बलरुस्कोनी का नाम इस सूची में शामिल ही नहीं है, जबकि सूची जारी होने के दो दिन पहले ही मिस्र की जनक्रांति से प्रेरित होकर इटली की महिलाएँ रंगीनमिजाज बलरुस्कोनी के खिलाफ सड़कों पर उतर आईं थीं।

दूसरे नंबर पर सीनेटर जॉन एनसाइन हैं, जिनका एक साल तक अपनी एक प्रचार कर्मचारी से प्रेम संबंध चला। सूची में तीसरा स्थान लुईसियाना के सीनेटर डेविड विटर ने पाया है, जो प्रांत की हाईप्रोफाइल कॉलगर्ल्स के नेटवर्क में काफी लोकप्रिय थे।

डेट्राइट के पूर्व मेयर क्वामे किलपैट्रिक ने इस सूची में चौथा स्थान बनाया है। मेयर के प्रांत की एक अधिकारी के साथ लंबे समय से संबंध थे। सीनेटर लैरी क्रेग को हवाईअड्डे के बाथरुम में एक महिला कर्मचारी के साथ अनुचित आचरण करने के लिए इस सूची में पाँचवे स्थान पर शामिल किया गया है। क्रेग ने अपना दोष स्वीकार कर लिया, जिसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

डेमोक्रेटिक सांसद बार्ने फ्रैंक के एक पुरुष सेक्सकर्मी के साथ संबंध उजागर होने के बाद उन्हें टाइम ने अपनी सूची में छठे स्थान पर रखा है। सूची में सातवाँ स्थान पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन को मिला है, जिनके मोनिका लेविंस्की के साथ संबंध लिखित संदेशों के माध्यम से उजागर हुए थे।

टाइम ने सबसे बड़े सेक्स स्कैंडलबाजों की सूची में आठवें स्थान पर पूर्व सीनेटर और राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी गैरी हार्ट को रखा है। इस खुलासे के बाद हार्ट ने राष्ट्रपति पद की दौड़ से हटने की घोषणा कर दी। सूची के नौवें स्थान पर न्यूयार्क के पूर्व गवर्नर एलियोट स्पिट्जर काबिज हुए हैं, जो वेश्यावृत्ति का हाईप्रोफाइल धंधा चलाते थे।

टाइम की इस सूची में सबसे नीचे एक समय में राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी रहे जॉन एडवर्डस हैं, जिनके एक उभरती हुई अभिनेत्री से संबंधों का 2008 में खुलासा हुआ। एडवर्डस को ‘पीपुल’ पत्रिका ने 2000 में ‘सबसे सेक्सी नेता’ चुना था। (भ

टूरिस्टों ने भारतीय व्यंजन को 5वें स्थान पर


टूरिस्टों ने भारतीय व्यंजन को 5वें स्थान पर रखा
नई दिल्ली। विदेशी सैलानियों को भारत के पर्यटन स्थलों के साथ भारतीय व्यंजनों का स्वाद भी खूब भाता है। यह बात इस सर्वे के परिणाम से साबित हो जाती है कि विदेशी सैलानियों के पसंदीदा व्यंजनों में भारतीय व्यंजनों का पाचवा स्थान है।

होटल्स डॉट कॉम द्वारा किए गए सर्वे के अनुसार, पहले स्थान पर इटली के पिज्जा और पास्ता आते हैं। इसके बाद क्रमवार फ्रांसीसी, थाई और चीनी व्यंजनों का स्थान है।

ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, नीदरलैंड्स और न्यूजीलैंड के पर्यटक भारतीय व्यंजनों का छक कर लुत्फ उठाते हैं। वहीं भारतीय सैलानियों की पहली पसंद घर में पका खाना है। उसके बाद नूडल्स पर आधारित चाइनीज व्यंजन हैं। जबकि फ्रांस के लोग चीन, जापान, स्पेन और यहा तक कि यूनान के व्यंजनों के मुकाबले भारतीय व्यंजन को ज्यादा तरजीह देते हैं। उन्हें अपना और इटली का भोजन सर्वाधिक पसंद है।

यही बात ऑस्ट्रेलिया के लोगों के संबंध में भी देखा जाता है। ऑस्ट्रेलियावासियों ने भारतीय व्यंजनों को दुनिया के सबसे स्वादिष्ट व्यंजनों में रखा है।

वहीं कोरिया और जापान के यात्रियों ने भारतीय व्यंजन के प्रति सबसे कम रुचि दिखाई। विश्व स्तर पर लगभग 4,000 यात्रियों के बीच किए गए सर्वे से पता चलता है कि यात्रियों ने प्रमुख एशियाई व्यंजनों में थाइलैंड के व्यंजन को सर्वाधिक पंसद किया।

जज पर घूसखोरी का आरोप लगाने वाले सांसद पर मुकदमा


तिरुअनंतपुरम। सुप्रीम कोर्ट के जज पर रिश्वतखोरी का सनसनीखेज आरोप लगाने वाले कांग्रेस सांसद के. सुधाकरन की परेशानियां बढ़ गई हैं। केरल पुलिस ने मंगलवार को उनके खिलाफ अपराध को छुपाने का मुकदमा दर्ज कर लिया।

सुधाकरन लोकसभा में केरल की कन्नूर सीट का प्रतिनिधित्व करते हैं। उन्होंने बीते शनिवार को कोल्लम में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का जिक्र करते हुए कहा था कि वह खुद 15 साल पहले सुप्रीम कोर्ट के एक जज को दी गई रिश्वत के गवाह हैं। सुधाकरन के इस बयान से राजनीतिक व न्यायिक हलकों में विवाद खड़ा हो गया था।

स्थानीय अधिवक्ता फोरम की शिकायत पर पुलिस ने सुधाकरन के खिलाफ भारतीय दंड संहिता [आइपीसी] की धारा 120 और 200 [अपराध को छुपाना और गलतबयानी] के तहत मामला दर्ज कर लिया है। फोरम ने अपनी शिकायत में कहा है कि सुधाकरन का बयान न्यायपालिका की अवमानना है।

कांग्रेस ने सुधाकरन के इस विवादास्पद बयान से किनारा कर लिया है। पार्टी का कहना है कि वह न्यायपालिका की विश्वसनीयता को चोट पहुंचाने वाले किसी भी प्रयास के खिलाफ है। कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने भी सुधाकरन के बयान को खारिज करते हुए कहा कि इस तरह के आरोपों से लोगों का न्यायपालिका के प्रति भरोसा उठ जाएगा।

करमापा मामले में इंटरपोल की मदद लेगी पुलिस


करमापा मामले में इंटरपोल की मदद लेगी पुलिस नहान। तिब्बती धर्मगुरु करमापा उग्येन त्रिनले दोरजी के धर्मशाला स्थित आवास से मिली विदेशी मुद्रा के मामले में कुछ विदेशी संदिग्धों से पूछताछ के लिए पुलिस इंटरपोल की मदद लेगी। इस सिलसिले में जल्द ही रेड कॉर्नर नोटिस जारी किया जाएगा। यह जानकारी मंगलवार को हिमाचल प्रदेश के पुलिस महानिदेशक एस मिनहास ने दी।

डीजीपी ने बताया कि करमापा के चीनी संबंधों की जांच चल रही है। इसी के चलते चीन के कुछ लोगों से पूछताछ की आवश्यकता है। इसलिए इंटरपोल की मदद लेने की जरूरत पड़ी है, ताकि उन्हें भारत लाया जा सके और जांच को आगे बढ़ाया जा सके।

करमापा का मामला कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी के समक्ष भी रखा गया। मंगलवार को राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग में बौद्ध समुदाय की सदस्य स्पालजस एंगमो की अध्यक्षता में करमापा के अनुयायियों का शिष्टमंडल नई दिल्ली में सोनिया गांधी से दस जनपथ में मिला। उन्होंने सोनिया गांधी को पूरे घटनाक्रम से अवगत कराया। उनसे मामले में हस्तक्षेप की मांग की। साथ ही करमापा को सिक्किम जाने की अनुमति दिये जाने की भी अपील की।

छह बेनामी संपत्तियां सरकार के नाम दर्ज

धर्मशाला। निर्वासित तिब्बतियों की छह बेनामी संपत्तियां मंगलवार को सरकार के नाम दर्ज हो गई। निर्वासित तिब्बती सरकार की ओर से दी गई सूची के आधार पर 44 संपत्तियां पहले ही सरकार के नाम चढ़ाई जा चुकी हैं। मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल ने कहा है कि बेनामी संपत्ति चाहे किसी हिमाचली अकृषक की हो या शरणार्थी की, सभी पर कानून के दायरे में कार्रवाई की जाएगी।

कांगड़ा के उपायुक्त आरएस गुप्ता ने बताया कि बेनामी संपत्तियों के दाखिल खारिज से पूर्व दोनों पक्षों को नोटिस भेजा गया था। इसके बाद तिब्बतियों के अधिवक्ता आरएस राणा की उपस्थिति में ही प्रक्रिया पूरी हुई।

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7 खून माफ बताएं


7 मर्दो से शादी!
विडियो: 7 खून माफ विडियो: 7 खून माफ बताएं विशाल भारद्वाज की फिल्म 7 खून माफ में प्रियंका चोपड़ा जिंदगी से लबालब और इश्क से मायूस सुजैना का रोल कर रही हैं, जो प्यार के मामले में खानाबदोश है। सुजैना सात मर्दो से शादी करती है। हिंदी सिनेमा के इतिहास में इतना अनूठा किरदार पहली बार आ रहा है। इस किरदार को पर्दे पर जीने का मौका पाकर प्रियंका खुश हैं। वे कहती हैं, मैं बहुत लकी हूं कि मुझे 7 खून माफ फिल्म मिली। मुझे विशाल भारद्वाज के साथ दोबारा काम करने का मौका मिला। सुजैना अलग तरह की लड़की है। ऐसी लड़की मैंने आज तक नहीं देखी। यह किसी के जीवन से प्रेरित नहीं है। सुजैना की अपनी दुनिया है। यह काल्पनिक किरदार है, इसलिए इसके साथ हम जो कर सकते थे, हमने किया।

विशाल भारद्वाज निर्देशित फिल्म 7 खून माफ रस्किन बांड की शॉर्ट स्टोरी पर आधारित है। इसमें प्रियंका पहली बार पचीस वर्ष की युवती से लेकर साठ वर्ष की वृद्धा के लुक में नजर आएंगी। यह फिल्म सुजैना के जीवन का सफर है। यह सुजैना के सच्चे प्यार की खोज की कहानी है। प्रियंका मानती हैं कि यह किरदार निभाना उनके लिए बहुत मुश्किल था। उनके अनुसार, सुजैना कहती है कि दुनिया के सारे गलत आदमी मेरी ही किस्मत में थे। टफ कैरेक्टर है यह। इसमें मेरे कई लुक हैं। मेरा लुक डिजाइन करने के लिए हॉलीवुड से मेकअप आर्टिस्ट बुलाए गए थे। उन्होंने मुझसे मेरे नानी, मां की तस्वीरें मांगी और उस हिसाब से मेरा लुक बनाया। फिजीकली इसमें मेरा लुक मॉम से प्रेरित है।

जॉन अब्राहम, नील नितिन मुकेश, नसीरुद्दीन शाह, इरफान खान, अन्नू कपूर, ऐलेक्जेंडर और विवान शाह ने 7 खून माफ में प्रियंका के सात पतियों की भूमिका निभाई है। प्रियंका ने जॉन अब्राहम से लेकर नील नितिन मुकेश, नसीरुद्दीन शाह और अपने से कम उम्र के नवोदित अभिनेता विवान के साथ अंतरंग दृश्य किए हैं। उनके अंतरंग दृश्यों की काफी चर्चा भी हो रही है। इस बाबत प्रियंका कहती हैं, शादी के बाद क्या स्त्री पति के साथ इंटीमेंट नहीं होती। सुजैना के अपने पतियों के साथ ऐसे दृश्य हैं। मैं आर्टिस्ट हूं और फिल्म करते समय मैं कैरेक्टर में रहती हूं। अपनी सहूलियत के हिसाब से मैं इस तरह के दृश्य करती हूं। मुझे इसमें कोई आपत्ति नहीं है।

7 खून माफ में नसीरुद्दीन शाह, अन्नू कपूर और इरफान खान जैसे बेहतरीन कलाकारों के साथ काम करने का अनुभव प्रियंका बांटती हैं, मैं बहुत नर्वस थी। नसीर सर के साथ मैंने शूटिंग के पहले वर्कशॉप की थी। वे अपने आप में एक्टिंग का इंस्टीट्यूशन हैं। इरफान खान के साथ मैंने इस फिल्म का पहला शेड्यूल किया था। तब मेरे कैरेक्टर की उम्र चालीस थी। इस फिल्म का पूरा अनुभव मेरे लिए रोमांचक और यादगार रहा।

विशाल भारद्वाज मानते हैं कि प्रियंका चोपड़ा अपने दौर की बेहतरीन अभिनेत्री हैं। वे हार्ड वर्किग और समर्पित हैं। प्रियंका के साथ उनका जो रैपो बना है, वैसा रैपो आज तक किसी कलाकार के साथ नहीं बना। अपने निर्देशक से अपने लिए ऐसी बातें सुनकर प्रियंका विनम्रता से सिर नीचे झुका लेती हैं। वे सिर्फ मुस्कुराती हैं और अपने आपको बहुत लकी कहती हैं। 7 खून माफ प्रियंका के करियर की बेहतरीन फिल्म मानी जा रही है। प्रियंका कहती हैं, मैंने बहुत मेहनत की है। मुझे फिल्म की शूटिंग के दौरान बहुत मजा आया। उम्मीद है कि दर्शकों को फिल्म पसंद आएगी। इसमें ब्लैक कॉमेडी है। बहुत चूमरस फिल्म है। प्रियंका की इस फिल्म को ए सर्टिफिकेट मिला है, लेकिन उनका मानना है कि इससे फिल्म के बिजनेस पर असर नहीं पड़ेगा। वे कहती हैं, मेरी फिल्म फैशन को भी ए सर्टिफिकेट मिला था, लेकिन वह चली। प्रियंका खुद को आशिक मिजाज मानती हैं। वे दार्शनिक अंदाज में कहती हैं, मैं सबसे प्यार करती हूं। मैं दुनिया के हर शख्स से प्यार करती हूं। पर यह सुनकर अजीब लगता है कि प्रियंका शाहिद कपूर को आज भी अपना सच्चा दोस्त ही मानती हैं। वे कहती हैं, सचमुच, शाहिद मेरे दोस्त ही हैं और कुछ नहीं..। प्रियंका की बात को मानने में कोई बुराई नहीं, क्योंकि लोग कहते आए हैं कि सच्चा दोस्त ही सब कुछ हो सकता है..।

Monday, 14 February 2011

भोजपुर नामक स्थान पर भोजेश्‍वर के नाम से ख्यात शिव मंदिर है। इसे पूरब का सोमनाथ भी कहते हैं।


पूरब का सोमनाथ है भोजपुर का भोजेश्‍वर शिव मंदिर


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सतीश सिंह

कला और संस्कृति के दृष्टिकोण से मध्यप्रदेश की धरती प्राचीन काल से ही उर्वर रही है। स्थापत्य कला में भी मध्यप्रदेश का स्थान भारत में अव्वल है। स्थापत्य कला का ही एक बेजोड़ नमूना मध्यप्रदेश की राजधानी और झीलों की नगरी भोपाल से तकरीबन 28 किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित भोजपुर नामक स्थान पर भोजेश्‍वर के नाम से ख्यात शिव मंदिर है। इसे पूरब का सोमनाथ भी कहते हैं।

21 वीं सदी में भले ही भोजपुर को गिने-चुने लोग जानते हैं, किन्तु मध्यकाल में इस नगर की ख्याति दूर-दूर तक फैली थी। मध्यकाल के आरंभ में धार के महान राजा भोज ने (1010-53) में भोजपुर नगर की स्थापना की थी। इस नगर को ख्यातलब्ध बनाने में मुख्य योगदान भोजपुर के भोजेश्‍वर शिव मंदिर और यहाँ पर बने विशाल झील का था। शिव मंदिर अपने अधूरेपन के साथ आज भी मौजूद है, लेकिन झील सूख चुकी है।

अपनी वास्तु योजना में यह मंदिर वर्गाकार है जिसका बाह्य विस्तार लगभग 66 फीट है। हालांकि इसका शिखर अपूर्ण है, फिर भी यह मंदिर चार स्तंभों के सहारे खड़ा है। ऊँचाई की ओर बढ़ने के क्रम में इसका आकार सूंडाकार हो गया है। तीन भागों में विभाजित निचला हिस्सा अष्टभुजाकार है, जिसमें 2.12 फीट वाले फलक हैं और उसमें से पुनश्‍च: 24 फलक वाली प्रशाखाएँ निकलती हैं। शिव मंदिर के प्रवेश द्वार का निचला हिस्सा अलंकार रहित है, पर उसके दोनों पार्श्‍वों में स्थापित दो सुदंर प्रतिमाएँ खुद-ब-खुद ध्यान आकृष्ट करती हैं। इसके तीनों तरफ उपरिकाएँ हैं जिन्हें तराशे गए 4 स्तंभ सहारा दिए हुए हैं।

शिवलिंग की ऊँचाई अद्भूत और आकर्षक है। 7.5 फीट की ऊँचाई तथा 17.8 फीट की परिधि वाला यह शिवलिंग स्थापत्य कला का बेमिसाल नमूना है। इस शिवलिंग को वर्गाकार एवं विस्तृत फलक वाले चबूतरे पर त्रिस्तरीय चूने के पाषाण खंडों पर स्थापित किया गया है।

आश्‍चर्यजनक रुप से इस मंदिर का शिखर कभी भी पूर्ण नहीं हो सका। अपितु इसको पूरा करने के लिए जो प्रयास किये गए, उसके अवशेष आज भी बड़े-बड़े पत्थर ले जाने के लिए बने सोपानों की शक्ल में हैं।

भोजेश्‍वर मंदिर के पास ही एक अधूरा जैन मंदिर है। मंदिर के अंदर तीर्थकरों की 3 प्रतिमाएँ हैं। महावीर स्वामी की मूर्ति तकरीबन 20 फीट ऊँची है। अन्य दोनों मूर्तियाँ पार्श्‍वनाथ की हैं। इसकी वास्तुकला आयताकार है। इतिहासकारों के अनुसार इसके निर्माण की अवधि भी भोजेश्‍वर मंदिर के समय की है।

भोजेश्‍वर मंदिर के पश्चिम में कभी एक बहुत बड़ा झील हुआ करती थी और साथ में उसपर एक बांध भी बना हुआ था, पर अब सिर्फ उसके अवशेष यत्र-तत्र बिखरे पड़े हैं। बाँध का निर्माण बुद्धिमतापूर्वक किया गया था। दो तरफ से पहाड़ियों से घिरी झील को अन्य दो तरफों से बालुकाइम के विशाल पाषाण खंडों की मदद से भर दिया गया था। ये पाषाण खंड 4 फीट लंबे और 2.5 फीट मोटे थे। छोटा बाँध लगभग 44 फीट ऊँचा था और उसका आधारतल तगभग 300 फीट चौड़ा तथा बड़ा बाँध 24 फीट ऊँचा और ऊपरी सतह पर 100 फीट चौड़ा था। उल्लेखनीय है कि यह बाँध तकरीबन 250 मील के जल प्रसार को रोके हुए था।

इस झील को होशंगशाह ने (1405-34) में नष्ट कर दिया। गौण्ड किंवदंती के अनुसार उसकी फौज को इस बाँध को काटने में 3 महीना का समय लग गया था। कहा जाता है कि इस अपार जलराशि के समाप्त हो जाने के कारण मालवा के जलवायु में परिवर्तन आ गया था।

कहने के लिए तो भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा यह मंदिर संरक्षित है, किन्तु विभाग के द्वारा इसके जीर्णोद्धार के लिए अभी तक कोई प्रयास नहीं किया गया है। यह सचमुच दुखद स्थिति है।

ऐसे अश्लील कार्यक्रमों का विरोध होना ही चाहिए


लेखक परिचय
गिरीश पंकज


सुप्रसिद्ध साहित्‍यकार गिरीशजी साहित्य अकादेमी, दिल्ली के सदस्य एवं रायपुर (छत्तीसगढ) से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिका सद्भावना दर्पण के संपादक हैं।नॉटी’ नहीं, ये ‘नंगी’ रातें हैं…


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ऐसे अश्लील कार्यक्रमों का विरोध होना ही चाहिए

गिरीश पंकज


रेडियों की दुनिया से जुड़े मेरे मित्र तेजपाल हंसपाल का पिछले दिनों एक मोबाइल-सन्देश मिला कि ”एक निजी रेडियो चेनल पर देर रात को एक अश्लील कार्यक्रम आता है.उसका नाम है- ”नॉटी रातें” उसको सुनें और उसका विरोध करे”. अमूमन फूहड़ताओं से भरे अनेक एफएम चेनल सुनने का पाप मैं नहीं करता, लेकिन मजबूरी में सुनना ही पडा. और सच कहूँ, तो सुन कर माथा शर्म से झुक गया. यह कार्यक्रम इतना पतनशील है, कि उसके लिये शब्द नहीं मिलते. परिवार के साथ क्या, इसे अकेले भी सुनना भारी लगने लगा. ऐसे कार्यक्रम सुनांने का मतलब है, अपने मनुष्य होने कि शर्त से नीचे गिरना है. दुःख और गुस्सा तब और बढ़ जाता है, कि यह कार्यक्रम एक औरत के माध्यम से प्रस्तुत कराया जा रहा है. बाज़ार में अपना माल खपाने वाले शातिर हो चुके हैं. ये लोग पुरुषों के लिये काम में आने वाली चीज़े भी बेचने के लिये औरतों का सहारा लेते है. इस वक्त बाज़ार अश्लीलता से पटा पडा है. और इसके लिये महिलाओं का इस्तेमाल हो रहा है.और कुछ कमजोर सोच वाली महिलाएं भी इनके चक्कर में आ जाती है. कुछ को अपना ”कैरियर” बनाना है तो कुछ के दूसरे लक्ष्य हैं. चिंता की बात यह है,कि अश्लीलता का कही कोई प्रतिवाद नहीं नज़र आता. शायद इसलिये कि मुर्दाशांति इस वैश्विक बाजारवाद की दें है. खा-पी कर मनोरंजन के लिये अपनी रातों को ”नॉटी” या अश्लील बनाने का जुगाड़ करने वाले समाज में अब पतन जैसे शब्द पिछड़ेपन की निशानी है. फिर भी प्रतिकार होना चाहिए.

मनोरंजक कार्यक्रम हों तो उनका स्वागत है लेकिन जो चीज़े यहाँ की फिज़ा में वैचारिक जहर घोलने का काम कर रही है, उनका विरोध ज़रूरी है. यह हमारी सामाजिक और नैतिक ज़िम्मेदारी है. एक रेडियो चेनल में जो कार्यक्रम आता है उसका सार यही होताहै कि वह स्त्री-पुरुषों से यह ”कन्फेस” करवाता है कि उन्होंने जाने-अनजाने कब, कहाँ कैसी अश्लील हरकत की. कुछ लोग अपना नाम छिपा लेते है. कुछ लोग हो सकता है, काल्पनिक नाम भी बताते हों. मै उस कार्यक्रम के ‘चरित्र’ को सुनने-समझने के लिये जिस दिन सुनरहा था, उस दिन एक लड़की ने महिला एंकर को बताया कि उसके एक ‘कजिन’ ने उसके साथ अश्लील हरकत की. लड़की उसे बारे में खुलकर बता रही थी. और वह कुछ-कुछ दुखी भी लग रही थी. एक बार एक लड़की ने बताया, कि एक बार वो सब हो गया जो नहीं होना चाहिए था. फिर बार-बार कहती थी, ”आप समझ रही है न मैं, क्या कह रही हूँ” . मै हिम्मत जुटा कर केवल दो बार ही यह कार्यक्रम सुन सका इसलिये कि मै इसके खिलाफ लिखना चाहता था. एक लेखक केवल यही कर सकता है. अब तो समाज का दायित्व है कि वह उन लोगों के खिलाफ खड़े हो, जो जानबूझ कर कोशिश करते रहते है,कि समाज में अश्लीलता फैले. आपको याद होगा कि अभी कुछ् महीने पहले टीवी पर एक कार्यक्रम आता था, जिसमे लोग अपने गुनाह कबूल किया करते थे, लोग दर्शकों के सामने अपनी तरह-तरह की नीचताओं का खुलासा करते थे. अंत में अवैध संबंधों की स्वीकारोक्ति भी करते थे. बाद में व्यापक विरोध के कारण यह कार्यक्रम बंद हो गया. उस कार्यक्रम का विरोध करने वाले कम नहीं थे. मतलब साफ़ है कि अगर घटिया कार्यक्रम बना कर दिखाने वालें लोग मौजूद है तो उसका विरोध करने वाले लोग भी है. अभी हमारा समाज पूरी तरह से पतित नहीं हो सका है.हैरत की बात है,कि उक्त अश्लील कार्यक्रम के विरुद्ध सामाजिक संस्थाए मौन है. यह चुप्पी चिंताजनक है.

समाज में अश्लीलता का वातावरण बनाने और अपने पतन का, अपने काले कारानामो का खुलासा करके लोग ”कन्फेस’ नहीं कर रहे, वे लोग दरअसल कमजोर मन-मस्तिष्क वाले श्रोताओं को एक तरह से गलत काम करने के लिये प्रेरित ही कर रहे है. किसी फिल्म का कोई दृश्य देख कर कुछ लोग उसकी नक़ल करने पर आमादा हो जाते है. रेडियो के इस अश्लील कार्यक्रम का भी उलटा असर होगा. इसलिये समय रहते इसके खिलाफ आवाज़ उठनी ही चाहिए. कार्यक्रम करना ही है, तो क्या कोई ऐसा कार्यक्रम नहीं बन सकता जिसमे कोई व्यक्ति यह बताये कि उसने लोक कल्याण के क्या-क्या काम किये या उसके जीवन में ऐसे लोग भी आये जिन्होंने उसे संकट से उबरा. या किसे विकलांग ने कोई बड़ा काम किया. या फिर आपने पिछले दिनों आपने क्या पढ़ा. आदि-आदि. लेकिन ऐसे कार्यक्रम बना कर निजी चेनल अपना दीवाला क्यों पिटवाएगा. जब वह ”अश्लील रातों” ‘को बेच-बेच कर समाज को बर्बाद करने का मजा ले रहा है, तो वह नैतिक मूल्यों को प्रोत्साहित करने वाले कार्यक्रम क्यों पेश करे?

आदिवासियों का प्रणय पर्व भगोरिया



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आदिवासियों का प्रणय पर्व भगोरिया
लेखक परिचय
सतीश सिंह


श्री सतीश सिंह वर्तमान में स्टेट बैंक समूह में एक अधिकारी के रुप में दिल्ली में कार्यरत हैं और विगत दो वर्षों से स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। 1995 से जून 2000 तक मुख्यधारा की पत्रकारिता में भी इनकी सक्रिय भागीदारी रही है। श्री सिंह दैनिक हिन्दुस्तान, हिन्दुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण इत्यादि अख़बारों के लिए काम कर चुके हैं।

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आधुनिकता का लबादा ओढ़कर हम धीरे-धीरे अपनी सभ्यता, संस्कृति, परम्परा और पहचान को भूलने लगे हैं। जबकि हमारे रीति-रिवाज हमारे लिए संजीविनी की तरह काम करते हैं। हम इनमें सराबोर होकर फिर से उर्जस्वित हो जाते हैं और पुन: दूगने रफ्तार से अपने दैनिक क्रिया-कलापों को अमलीजामा पहनाने में अपने को सक्षम पाते हैं।

फाल्गुन महीने में ठीक होली से पहले मध्यप्रदेष के झाबुआ जिले और उसके आसपास के क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी प्रणय पर्व ‘भगोरिया’ को पूरे जोश-खरोश के साथ मस्ती एवं आनंद में डूबकर मनाते हैं। इस समुदाय के बीच में बाजार को हाट कहा जाता है, जो एक निश्चित अंतराल पर लगता है। इस हाट में इनके जरुरत की हर वस्तु उपलब्ध रहती है। भगोरिया पर्व का इस हाट से अटूट संबंध है। क्योंकि इस पर्व की शुरुआत फाल्गुन महीने में लगने वाले अंतिम हाट वाले दिन से होता है।

लगभग सात दिन तक चलने वाले इस पर्व में जबर्दस्त धूम-धाम रहती है। उस क्षेत्र में अवस्थित सभी गांव व कस्बे से आकर आदिवासी इस पर्व में शामिल होते हैं। युवाओं के बीच अच्छा-खासा उत्साह रहता है। उनकी मस्ती देखने लायक रहती है।

हाट में हर प्रकार के अस्थायी दुकान लगे रहते हैं। पान, गुलाल और शृंगार के दुकानों में खूब चहल-पहल रहती है। युवाओं के वस्त्र भड़कीले और अपने प्रियतम या प्रियतमा को आकर्षित करने वाले होते हैं।

मुँह में पान का बीड़ा या हाथों में कुल्फी का मजा लेते हुए युवक-युवतियों तथा किषोर-किशोरियों को आप आसानी से हाट में देख सकते हैं। पूरा माहौल हँसी-ठिठोली व मस्तीभरा रहता है। आदिवासी बालाओं से छेड़खानी करने वाले आदिवासी युवाओं को इस कृत्य के लिए कोई सजा नहीं दी जाती है। कोई इसे बुरा नहीं मानता है। सबकुछ उनके रीति-रिवाज का हिस्सा होता है।

रंग और गुलाल से लोग इस कदर एक-दूसरे को रंग देते हैं कि कोई पहचान में नहीं आता है। संगीत तथा लोक नृत्य का समां इस तरह से बंधता है कि सभी मौज-मस्ती, उमंग एवं उल्लास में अलमस्त हो जाते हैं।

व्यापक स्तर पर मिठाई व नमकीन खरीदी जाती है। घर में पकवान बनाए जाते हैं। खुले मैदान में बैठकर मांस व मदिरा का भी सेवन किया जाता है।

आदिवासियों के लिए इस पर्व की महत्ता अतुलनीय है। इस पर्व में अपनी सहभागिता के लिए दूसरे प्रदेश में या दूर-दराज में रहने वाले आदिवासी भी अपने गांव व कस्बे लौट जाते हैं।

दरअसल इस पर्व में जीवन साथी का चयन किया जाता है। इसलिए इस पर्व का महत्व बेषकीमती है। युवा सज-धजकर उसे पान का बीड़ा खिलाते हैं, जिसे वे अपना हमसफर बनाना चाहते हैं। यदि कोई युवती पान का बीड़ा खाने के तैयार हो जाती है तो माना जाता है कि वह विवाह के लिए तैयार है।

इस मूक सहमति के बाद दोनों अपने घर से भाग जाते हैं। आमतौर पर कोई इसका प्रतिवाद नहीं करता है। फिर भी परिवार द्वारा विरोध जताये जाने की स्थिति में पंचों के हस्तक्षेप के बाद ही उनका विवाह सम्भव हो पाता है।

पान का बीड़ा खिला कर अपने प्रेम का इजहार करने के अलावा इस आदिवासी समुदाय में अपने प्रेमिका को चूड़ी पहनाकर भी अपने प्रेम को दर्शाने का चलन है। अगर किसी युवती को कोई युवक चूड़ी पहना देता है तो माना जाता है कि वह उसकी पत्नी बन गई।

गौरतलब है कि 4-5 सालों से इस पर्व के प्रति आदिवासियों की उदासीनता स्पष्ट रुप से दृष्टिगोचर हो रही है। भगोरिया हाट के प्रति आदिवासियों का रुझान कम हो चुका है। दूसरे प्रदेश में रहकर अपनी जीविका का निर्वाह करने वाले इस समुदाय के सदस्य इस पर्व के अवसर पर अपने पैतृक गाँव व कस्बे आने से परहेज करने लगे हैं।

इतना ही नहीं अब आदिवासी युवा इन पध्दतियों से विवाह करने में हीनता महसूस करने लगे हैं। उनको लगता है कि वे अधतन जमाने के साथ कदम-से-कदम मिलाकर नहीं चल पा रहे हैं।

पर यहाँ विडम्बना यह है कि इस तरह की सोच उनको खुद अपने जड़ों से अलग कर रहा है, बावजूद इसके उनको धीरे-धीरे अपने मरने का अहसास नहीं हो पा रहा है।

वेलैंटाइन डे (14फरवरी) पर विशेषः



वेलैंटाइन डे (14फरवरी) पर विशेषः

-संजय द्विवेदी

क्या प्रेम का कोई दिन हो सकता है। अगर एक दिन है, तो बाकी दिन क्या नफरत के हैं ? वेलेंटाइन डे जैसे पर्व हमें बताते हैं कि प्रेम जैसी भावना को भी कैसे हमने बांध लिया है, एक दिन में या चौबीस घंटे में। पर क्या ये संभव है कि आदमी सिर्फ एक दिन प्यार करे, एक ही दिन इजहार-ए मोहब्बत करे और बाकी दिन काम का आदमी बना रहे। जाहिर तौर पर यह संभव नहीं है। प्यार एक बेताबी का नाम है, उत्सव का नाम है और जीवन में आई उस लहर का नाम है जो सारे तटबंध तोड़ते हुए चली जाती है। शायद इसीलिए प्यार के साथ दर्द भी जुड़ता है और शायर कहते हैं दर्द का हद से गुजरना है दवा हो जाना।

प्रेम के इस पर्व पर आंखों का चार होना और प्रेम प्रस्ताव आज एक लहर में बदल रहे हैं। स्कूल-कालेजों में इसे खासी लोकप्रियता प्राप्त है। इसने सही मायने में एक नई दुनिया रच ली है और इस दुनिया में नौजवान बिंदास घूम रहे हैं और धूम मचा रहे है। भारतीय समाज में प्रेम एक ऐसी भावना है जिसको बहुत आदर प्राप्त नहीं है। दो युवाओं के मेलजोल को अजीब निगाह से देखना आज भी जारी है। हमारी हिप्पोक्रेसी या पाखंड के चलते वेलेंटाइन डे की लोकप्रियता हमारे समाज में इस कदर फैली है। शायद भारतीय समाज में इतने विधिनिषेध और पाखंड न होते तो वेलेंटाइन डे जैसे त्यौहारों को ऐसी सफलता न मिलती। किंतु पाखंड ने इस पर्व की लोकप्रियता को चार चांद लगा दिए हैं। भारत की नौजवानी अपने सपनों के साथ जी रही है किंतु उसका उत्सवधर्मी स्वभाव हर मौके को एक खास इवेंट में बदल देता है। प्रेम किसी भी रास्ते आए उसका स्वागत होना चाहिए। वेलेंटाइन एक ऐसा ही मौका है , आपकी आकांक्षाओं और सपनों में रंग भरने का दिन भी। सेंट वेलेंटाइन ने शायद कभी सोचा भी न हो कि भारत जैसे देश में उन्हें ऐसी लोकस्वीकृति मिलेगी।

बाजार में त्यौहारः

वेलेंटाइन के पर्व को दरअसल बाजार ने ताकत दी है। कार्ड और गिफ्ट कंपनियों ने इसे रंगीन बना दिया है। भारत आज नौजवानों का देश है। इसके चलते यह पर्व एक अद्भुत लोकप्रियता के शिखर पर है। नौजवानों ने इसे दरअसल प्रेम पर्व बना लिया है। इसने बाजार की ताकतों को एक मंच दिया है। बाजार में उपलब्ध तरह-तरह के गिफ्ट इस पर्व को साधारण नहीं रहने देते, वे हमें बताते हैं कि इस बाजार में अब प्यार एक कोमल भावना नहीं है। वह एक आतंरिक अनूभूति नहीं है वह बदल रहा है भौतिक पदार्थों में। वह आंखों में आंखें डालने से महसूस नहीं होता, सांसों और धड़कनों से ही उसका रिश्ता नहीं रहा, वह अब आ रहा है मंहगे गिफ्ट पर बैठकर। वह महसूस होता है महंगे सितारा होटलों की बिंदास पार्टियों में, छलकते जामों में, फिसलते जिस्मों पर। ये प्यार बाजार की मार का शिकार है। उसे और कुछ चाहिए, कुछ रोचक और रोमांचक। उसकी रूमानियत अब पैसे से खिलती है, उससे ही दिखती है। यह हमें बताती है कि प्यार अब सस्ता नहीं रहा। वह यूं ही नहीं मिलता। लैला-मजनूं, शीरी-फरहाद की बातें न कीजिए, यह प्यार बाजार के उपादानों के सहारे आता है, फलता और फूलता है। इस प्यार में रूह की बातें और आत्मा की रौशनी नहीं हैं, चौधिंयाती हुयी सरगर्मियां हैं, जलती हुयी मोमबत्तियां हैं, तेज शोर है, कानफाड़ू म्यूजिक है। इस आवाज को दिल नहीं, कान सुनते हैं। कानों के रास्ते ये आवाज, कभी दिल में उतर जाए तो उतर जाए।

इस दौर में प्यारः

इस दौर में प्यार करना मुश्किल है और निभाना तो और मुश्किल। इस दौर में प्यार के दुश्मन भी बढ़ गए हैं। कुछ लोगों को वेलेंटाइन डे जैसे पर्व रास नहीं आते। इस अवसर पर वे प्रेमियों के पीछे हाथ धोकर पड़ जाते हैं। देश में अनेक संगठन चाहते हैं कि नौजवान वेलेंटाइन का पर्व न मनाएं। जाहिर तौर पर उनकी परेशानियों हमारे इसी पाखंड पर्व से उपजी हैं। हमें परेशानी है कि आखिर कोई ऐसा त्यौहार कैसे मना सकता है जो प्यार का प्रचारक है। प्यार के साथ आता बाजार इसे प्रमोट करता है, किंतु समाज उसे रोकता है। वह चाहता है संस्कृति अक्षुण्ण रहे। संस्कृति और प्यार क्या एक-दूसरे के विरोधी हैं ? प्यार, अश्ललीलता और बाजार मिलकर एक नई संस्कृति बनाते हैं। शायद इसीलिए संस्कृति के रखवाले इसे अपसंस्कृति कहते हैं। सवाल यह है कि बंधन और मिथ्याचार क्या किसी संस्कृति को समर्थ बनाते हैं ? शायद नहीं। इसीलिए नौजवान इस विधि निषेधों के खिलाफ हैं। वे इसे नहीं मानते, वे तोड़ रहे हैं बंधनों को। बना रहे हैं अपनी नई दुनिया। वे इस दुनिया में किसी के हस्तक्षेप के खिलाफ हैं। वे चाहते हैं प्यार जिए और सलामत रहे। प्यार की जिंदाबाद लगे। बाजार उनके साथ है। वह रंग भर रहा है, उन्हें प्यार के नए फलसफे समझा रहा है। प्यार के नए रास्ते बता रहा है। इस नए दौर का प्यार भी क्षणिक है ,वह एक दिन का प्यार है। इसलिए वन नाइट स्टे एक हकीकत बनकर हमें मुंह चिढ़ा रहा है। ऐसे में रास्ता क्या है ? सहजीवन जब सच्चाई में बदल रहा हो। महानगर अकेले होते इंसान को इन रास्तों से जीना सिखा रहे हों। एक वर्चुअल दुनिया रचते हुए हम अपने अकेले होने के खिलाफ खड़े हो रहे हों तो हमारा रास्ता मत रोकिए। यह हमारी रची दुनिया भले ही क्षणिक और आभासी है, हम इसी में मस्त-मस्त जीना चाहते हैं। नौजवान कुछ इसी तरह से सोचते हैं। प्यार उनके लिए भार नहीं है, जिम्मेदारी नहीं है, दायित्व नहीं है, एक विनिमय है। क्योंकि यह बाजार का पैदा किया हुआ, बाजार का प्यार है और बाजार में कुछ स्थाई नहीं होता। इसलिए उन्हें झूमने दीजिए, क्योंकि इस कोलाहल में वे आपकी सुनने को तैयार नहीं हैं। उन्हें पता है कि आज वेलेंटाइन डे है, कल नई सुबह होगी जो उनकी जिंदगी में ज्यादा मुश्किलें,ज्यादा चुनौतियां लेकर आने वाली है- इसलिए वे कल के इंतजार में आज की शाम खराब नहीं करना चाहते। इसलिए हैप्पी वेलेंटाइन डे।

शिक्षक ने बेच दिया सरकारी स्कूल

शिक्षक ने बेच दिया सरकारी स्कूल
सिलवानी 14 फरवरी 2011। आदिवासी बाहुल्य तहसील सिलवानी में लगता है सारे काम मनमर्जी से हो रहे है। ऐसा ही एक मामला ग्राम पंचायत पौनार गद्दरा के सरकारी स्कूल का भी सामने आया है।
यहां के स्कूल प्रभारी ने पुराना प्राथमिक शाला भवन बिना किसी को बताए ही बेच दिया। न तो इसकी जानकारी शिक्षा विभाग के पास है न ही पंचायत के पास।
ग्राम पंचायत पौनार गद्दरा में पुराना प्राथमिक शाला भवन था। यहां के स्कूल प्रभारी रहमत उल्ला खान ने एक साल पहले इस स्कूल भवन को कौड़ियों के दाम में बेच दिया। इस भवन को बेचने के लिए न तो शिक्षा विभाग से कोई स्वीकृति ली गई न ही पंचायत को जानकारी दी गई। बिना किसी को बताए स्कूल प्रभारी ने लाखों के भवन को 6 हजार रूपए में ही बेच दिया। यह सब इतने गुपचुप तरीके तरीके से किया गया, कि बेचने के एक साल बाद भी किसी अधिकारी को भनक तक नहीं लगी। भवन खरीद्दारों की मानें तो प्रभारी शिक्षक ने आधा दर्जन लोगों को भी नहीं बुलाया और नीलामी कर दी और कहा कि अब यह भवन तुम्हारा हो गया। इसके बाद से ही भवन तोड़ने का काम शुरू हो गया। सबसे बड़ी बात तो यह है, कि इतने दिन बितने के बाद भी शिक्षा विभाग के किसी अधिकारी ने यह जहमत नहीं उठाई, कियह भवन किसके कहने पर तोड़ा जा रहा है। पंचायत सचिव के मुताबिक बेचने वाले प्रभारी शिक्षक ने पंचायत में इसकी कोई जानकारी नहीं दी, न ही किसी से स्वीकृति ली। गांव वालों को जरूर पता है, कि यह स्कूल भवन अब बिक चुका है।
नीलामी का भी पता नहीं : भवन को बेचने के लिए नीलामी का भी पता नहीं चलने दिया गया। स्कूल भवन को खरीदने वाले महाराज सिंह और गिरधारी ने बताया कि मास्टर साहब ने 4-6 लोगों को इकट्‌ठा करके नीलामी कर दी। इसकी कीमत सिर्फ 6 हजार रूपए लगाई गई। भवन खरीदने के बाद र्इंटे और मलबा निकालने का काम किया जा रहा है। खरीददारों का कहना है कि इसमें करीब 50-60 हजार ईंटे अच्छी वाली निकलेगी। इनकी कीमत लगभग दो से ढाई लाख रूपए तक हो सकती है। 3-4 क्विंटल यहां से लोहा भी निकलना बताया जा रहा है।
इनका कहना है
ऐसी कोई परमिशन स्कूल बिल्डिंग बेचने की शिक्षा विभाग द्वारा नहीं दी गई है। आप डीपीसी से चर्चा कर ले।
अनिल वैद्य, जिला शिक्षा अधिकारी रायसेन
न ही मैं अधिकृत हूं, न ही स्कूल भवन बेचने की कोई परमिशन दी गई।
पीके सिंग, डीपीसी रायसेन
स्कूल भवन बेचने की मुझे जानकारी नहीं है, जिसने बेचा है उस प्रभारी शिक्षक का वेतन रोका जाएगा और कार्रवाई की जाएगी।
रामगोपाल भार्गव, ब्लाक शिक्षा अधिकारी, सिलवानी
मैं अभी नया आया हूं। स्कूल की बिल्डिंग नीलाम हो गई है, यह गांव वालों से पता चला है। पंचायत में इसको बेचने का कोई लेखा जोखा नहीं है।
जीवन मेहरा, सचिव ग्राम पंचायत पौनार गद्दरा
रजिस्टर में किसी का नाम और पढ़ा रहा कोई और
ग्राम पंचायत पौनार गददरा के प्राथमिक शाला में सब कुछ फर्जी तरीके से चल रहा है। यहां रिकार्ड में अतिथि शिक्षक के लिए अशोक कुमार आदिवासी का नाम दर्ज है लेकिन स्कूल में पढ़ाने के साथ ही अतिथि शिक्षक का वेतन मो. ईस्तिखार ले रहे है। बाकायदा हर दिन स्कूल आकर वह बच्चों को पढ़ा रहे है। मो. ईस्तिखार स्कूल प्रभारी के कोई रिश्तेदार बताए जाते है। इतना सब कुछ इस स्कूल में फजीं होने के बावजूद भी आज तक कोई कार्रवाई किसी पर नहीं हो सकी है। बताया तो यहां तक जाता है कि स्कूल प्रभारी अपनी मर्जी से ही स्कूल आते है।
Date: 14-02-2011 Time: 11:23:53

बीजिंग। चीन में प्रौद्योगिकी विशेषज्ञों ने इंटरनेट उपयोगकर्ताओं को चेताया है कि उन्हे वेलेंटाइंस डे आधारित कम्प्यूटर वायरस से सजग रहना चाहिए।



बीजिंग। चीन में प्रौद्योगिकी विशेषज्ञों ने इंटरनेट उपयोगकर्ताओं को चेताया है कि उन्हे वेलेंटाइंस डे आधारित कम्प्यूटर वायरस से सजग रहना चाहिए।

चाइना नेशनल कम्प्यूटर वायरस इमर्जेसी रेस्पांस सेंटर ने कम्प्यूटर उपयोगकर्ताओं को चेतावनी जारी हुए सोमवार को एक संदेश जारी किया कि उन्हे विषय वाली पंक्ति में वेलेंटाइंस डे संदेश लिखे स्पैम मेल नहीं खोलने चाहिए। समाचार पत्र 'चाइना डेली' के अनुसार इस तरह के मेल्स में 'वार्म अंडरस्कोर ब्लेबला डाट बी', 'वीबीएस अंडरस्कोर आईलवयू' और 'वीबीएस अंडरस्कोर वेलेंटाइन डाट ए' जैसे वायरस हो सकते है।

सेंटर ने आनलाइन खरीददारी करने वालों को भी चेताया है कि वेलेंटाइंस डे के सामान का आर्डर देते समय उन्हे सावधान रहना चाहिए, क्योंकि कुछ आकर्षक विज्ञापन बोगस हो सकते है और उससे कम्प्यूटर को नुकसान पहुंच सकता है। 'चाइना डेली' ने कहा है कि इंटरनेट फोरम और आनलाइन चैटिंग टूल्स के जरिए भी वायरस फैल रहे है।

Thursday, 3 February 2011

आदिवासियों में प्रेम संबंध


भारतीय आदिवासियों के जीवन में सेक्स का अपना महत्व है। वे आधुनिक सभ्यता से बहुत दूर संस्कृति परिवर्तन से अछूते हैं। दिन भर की थकान के बाद ये आदिवासी रात्रि होते ही रात्रि क्लबों में एकत्रा हो उत्सव मनाते हैं। इन रात्रि कलबों को युवा-गृह के नाम से सम्बोधित किया जाता है। केवल युवक-युवतियों को इन युवा-गृहों में आने दिया जाता है।

इनकी रंगीन रातें नाच-गाने से आरंभ होकर शराब के दौर के साथ रेंगती हुई प्रणय-लीला की मादकता के साथ समाप्त हो जाती है। सेक्स के इस व्यापार को पाप-पुण्य या नैतिकता के तराजू में नहीं तोला जाता। इसके बावजूद इन युवा गृहों में यौन ज्ञान का प्रशिक्षण दिया जाता है। युवक-युवतियां इन्हीं युवा-गृहों के माध्यम से मन-पसंद जीवनसाथी का चुनाव करते हैं। हमारे देश के विभिन्न भागों में बसने वाले आदिवासियों के अलग-अलग रीति रिवाज हैं।

बस्तर जिले के आदिवासियों में युवा-गृहों के सदस्य केवल अविवाहित लोग ही हो सकते हैं। विधुरों को भी सदस्य बनने का अधिकार प्राप्त है। दस वर्ष की आयु होने पर प्रत्येक युवक-युवती को सदस्य न बनने पर समाज विरोधी कार्य मान कर दण्ड देने की व्यवस्था है। छोटे लड़के-लड़कियों को यौन ज्ञान का प्रशिक्षण दिया जाता है। सदस्य चाहे ऊंची या नीची जाति के हों अथवा अमीर हो या गरीब, सभी को समान दृष्टि से देखा जाता है और उन्हें समान अधिकार होते हैं।

युवा-गृह में प्रत्येक युवती हर युवक सदस्य की पत्नी होती है और एक ही युवक के साथ स्थायी संबंध रखना दोष-पूर्ण माना जाता है। गर्भ धारण करना अशुभ माना जाता है और ऐसी अवस्था में युवा गृह से बाहर निकाल कर उस व्यक्ति के साथ स्थायी रूप से विवाह करवा दिया जाता है जिसके द्वारा गर्भ धारण हुआ हो।


मध्य-प्रदेश प्रान्त के एक भाग में स्थित आदिवासी स्त्रिायां दुहरी नैतिकता अपनाती हैं। यहां की स्त्रिायां अपने पीहर में रहते हुए अपनी इच्छानुसार चाहे जिस पुरूष के साथ प्रणय कर सकती हैं। घर आये अतिथियों के सत्कार स्वरूप रात को वे उनकी शैय्या की शोभा बढ़ाती हैं। इसके विपरीत अपने ससुराल में इन्हें अपने पति के प्रति पूर्ण रूप से वफादार रहना पड़ता है। इन स्त्रिायों के पीहर चले जाने के बाद इनके पति अन्य विवाहित स्त्रियों के साथ आनंद लेते हैं।
आसाम के आदिवासियों में दस वर्ष से बड़ी युवतियां युवा-गृहों में रात के समय आकर एक साथ सोती हैं। उनके प्रेमी युवक रात में वहीं पहंुच जाते हैं। बस्तर के आदिवासियों की तरह उनके रीति रिवाज समान होते हैं।

मालाबार प्रांत के आदिवासी समूह में लड़कियों का विवाह बहुत कम आयु में हो जाता है। उन्हें शीघ्र ही तलाक दिलवा दिया जाता है। दुबारा इनका विवाह नहीं होता और वे अपने पीहर में रहती हैं। समय समय पर मनपसन्द प्रेमी चुनकर वे उनके साथ यौन संबंध में जो औलाद जन्म लेती है उस पर लड़की की मां का अधिकार माना जाता है इनके समाज में पिता का कोई महत्व नहीं होता।

नीलगिरी की आदिवासियों की विवाहित स्त्रिायां चाहे जितने भी पुरूषों से संबंध रख सकती हैं समाज उसे बुरा नहीं मानता। विवाहित स्त्राी का कोई भी पुराना प्रेमी उसके पति से इजाजत लेकर उसके पास सुविधा-अनुसार आ जा सकता है। इस अनुचित संबंध से पैदा हुई संतान पर वास्तविक पति का अधिकार होता है।

अल्मोड़ा के आदिवासियों में इस प्रकार के मुक्त यौन समागम की खुली छूट नहीं है। युवा-गृहों में युवा वर्ग के लोग संगीत, नृत्य और मदिरा पान के बाद अपने जीवन साथी का चुनाव करते हैं। बाद में विवाह की रस्म पूरी करके सह जीवन बिताते हैं। किसी पराये पुरूष को मदिरा के नशे में यदि स्त्राी अपना शरीर गलती से सौंप देती है तो उसके पति पर निर्भर होता है कि उसे क्षमा करे या नहीं। उस स्थिति में होने वाली संतान पर पति का हक माना जाता है।


अब उड़ीसा प्रांत के आदिवासियों को ही लीजिए। यहां के प्रणय गृहों में संध्या के समय सभी अविवाहित युवतियां एकत्रा हो जाती हैं। दूर-दूर से नौजवान लड़के उपहार प्रणय-संलाप करने इन गृहों में आते हैं। जहां युवतियां भुने हुए मांस और शराब के साथ उनका स्वागत करती हैं। वे तमाम रात एक साथ बिताते हैं। बेदर्दी से परस्पर छेड़-छोड़ और मजाक करते हैं। नाच-गाना चलता रहता है। चुम्बन की प्रथा इनमें नहीं होती। कुछ दिनों के मेल-मिलाप के बाद जो युवक-युवतियां परस्पर चाहने लगते हैं, वे पहली बार शारीरिक संभोग कर सगाई कर लेते हैं और उनकी शादी पक्की मान ली जाती है।
आंध्र प्रदेश के बंजारे आदिवासी समूह में पुरूषों की अपेक्षा स्त्रिायां अधिक कामुक होती हैं। गैर मर्दों से वे संबंध बिल्कुल नहीं रखती। बारह वर्ष की आयु में उनका विवाह कर दिया जाता है। विवाह से पूर्व अन्य युवकों के साथ संबंध रखने में उन्हें काई रूकावट नहीं। यदि लड़की मां बन जाए तो उसके प्रेमी को उससे विवाह करना पड़ता है। विवाह सामाजिक नियमानुसार होता है।

मैसूर की आदिम जातियों में रात्रि के युवा गृहों में आकर युवक-युवतियां अपने प्रेमी-प्रेमिका के साथ रात बिताते हैं। जिनकी कोई प्रेमिका नहीं होती वे युवक रात्रि के समय घर के बाहर निकल कर घूमते है और लड़कियां ढूंढ़ते हैं जो रात के समय उन्हें शैय्या पर उन्हें साथी बना सके। लड़कियां अपने निवास स्थान पर ऐसे लड़कों का स्वागत करती हैं। इसके लिए दोनों पक्षों के घर वालों से पूरी छूट है। जब कोई लड़का लगातार किसी लड़की के यहां आता रहता है तो वे शादी के लिए एक-दूसरे को स्वीकार कर लेते हैं।

नीलगिरी की एक और जाति के आदिवासियों में विवाह के बाद भी स्त्राी-पुरूष तीन वर्ष तक युवा-गृहों में आकर मनोरंजन करते हैं जहां की स्त्रिायां यौन के मामले में अपने पति को धोखा देने में आनंद का अनुभव करती हैं। यदि कोई स्त्राी गर्भवती हो जाए तो वह और उसका पति युवा-गृहों में प्रवेश नहीं पा सकता।

आदिवासियों में युवा-गृहों का महत्वशाली स्थान है और उनमें सेक्स का प्रसार व्यापक-रूप में है। आदिवासियों के जीवन और सभ्यता में वे युवा-गृह एक महत्वपूर्ण अंग की तरह हैं जो उनमें नव-जीवन का संचार करते हैं।

ः— सतिश हांडा

कल रात भूल हो गयी उनसे


kanupriya.das · गर्भनिरोधक की हर खोज ने स्त्री को कुछ और मुक्ति दी है, कुछ और विकल्प दिया है . जीवन जीने की शैली का चुनाव, बच्चे होँ या न होँ , होँ तो कितने और कब? यह सब चुनाव तभी सम्भव हुआ जबसे गर्भनिरोधक का विकल्प उसे मिला. उससे पहले यदि विकल्प नाम की कोई वस्तु थी तो केवल विवाह करना या न करना हीँ .

अब यह नई इमरजेंसी गोली आ गयी है . इसके विज्ञापन में हीं कहा जाता है कि यह गर्भपात से बेहतर है. जो की गलत नहीं हो सकता. लेकिन क्या सथ मेँ यह न्ही बताया जाना चाहिए कि यह केवल अपातकाल के लिए है. इसका गर्भनिरोधक की तरह उपयोग नही होना चाहिए ? कोई जीवनकाल मेँ दो चार बार ले ले , तो समझा जा सकता है किंतु इसे बार-बार लिया जाए तो यह अपने शरीर के हार्मोंस के साथ खिलवाड है. कहीँ भी इसे नही बताया जाता कि कहुन इसे ना ले.

सिरदर्द की गोली की तरह यदि स्त्रियाँ इसका उपयोग करने लगेंगी तो इसका दिर्घकालिन परिणाम क्या होगा? शायद हमेँ पता नही है . हो सकता है कि गोली लेने के बाद केवल छोटो मोटे दुष्परिणाम हीँ होते होँ जैसे मितली, चक्कर , सिरदर्द फिर भी एक दुष्परिणाम होने का भय तो है हीँ . ठिक वैसे ही जैसे हर अच्छी वस्तु के साथ होता है. यह दो परिणाम हैँ ” यौन रोग” और पुरूष का अपने उत्तरदायित्व से मुँह मोडना .

यह बाज़ार की नई साजिश है. जो प्रो- मेन है . अब वह सोच सकते हैँ कि कोई गलती हुई तो यह गोली तो है न ! होना यह चाहिए की तम्बाकु उत्पादोँ के विज्ञापनोँकी तरह हीँ , इस गोली के विज्ञापन के साथ भी चेतावनी दिखाई जानी चाहिए . यह गोली बलात्कार या अन्य किसी आपदा मेँ वरदान साबित हो सकती है, किन्तु नियमित उपयोग के लिए नही है, यह ध्यान रखना चाहिए . जैसे हम हर स्थिति से निबटने के लिए प्लान “ए” और प्लान “बी” भी बनाते हैँ , वैसे हीँ यह गोली केवल प्लान बी हो सकती है. स्त्रियाँ वैसे हीँ अपने स्वास्थ्य के प्रति लापरवाह होती हैँ. कहीँ यह आपातकालिन गर्भनिरोधक गोली कोई आपदा हीँ न ले आए.

सलाना करीब 82 लाख गोलीयोँ की बिक्री को देखते हुए , दवा कम्पनियाँ , इसका खुब विज्ञापन कर रही हैँ , लेकिन दुरउपयोग को रोकने के बारे मेँ ज्यादा जागरूकता नही पैदा की जा रही. विज्ञापनोँ के चलते जो लोग इस बात को जान गयेँ हैँ , कि ये गोलियाँ , अनचाहे गर्भ को रोकती हैँ , लेकिन आपातकाल शब्द पर जोर नही दिया जा रहा है. सिप्ला की आई- पिल भारत मेँ सबसे ज्यादा बिकने वाला ब्राँड है, जबकी दूसरे ब्राँडो मेँ मैनकाइन्ड फार्मा का अन्वांटेड 72 तथा अन्य ब्रान्ड भी हैँ .

डॉक्टरोँ का बडा वर्ग , इनकी खुलेआम बिक्री का समर्थन करता है, हलांकि कुछ डॉक्टरोँ का मानना है कि इन्हे डॉक्टर की सलाह पर दिया जाना चाहिए. लोगोँ को समझना चाहिए कि एक आई-पिल नियमित गर्भनिरोधकोँ का विकल्प नही हो सकती. इसके साथ हीँ इसका इस्तेमाल आपातकाल मेँ ही करना चाहिए जिसका आशय पैदा किए गये आपातकाल से कतई नही है. यह गोलीयाँ एड्स का खतरा भी पैदा कर सकती हैँ . इन दवाओँ के बारे मेँ जरूरी निर्देषोँ को स्पष्ट रूप से प्रकाशित करने की तत्काल जरूरत है. साथ हीँ इनके दुष्प्रभावोँ और वैधानिक चेतावनी के बारे मेँ बताया जाना चाहिए . इससे इनका दुरउपयोग रूकेगा.ऐसा नही है कि इससे पहले महिलाओँ के लिए कोइ गर्भनिरोधक दवाई बाज़ार मेँ नही आई. लेकिन अब सिर्फ 72 घंटे मेँ ही सुरक्षा की गारंटी देती यह दवाईयाँ अपना युएसपी, इसे ही बना रही हैँ . सामाजिक मनोवोज्ञान के जानकार, इसके अन्य पहलूओँ को गम्भीरता से लेते हैँ , उनका मानना है , कि तेजी से बदलते भारत मेँ , इसका नुकसान ज्यादा है .

सिप्ला की वेबसाईट पर निचे गुलाबी रंग से यह साफ-साफ लिखा हुआ है: – इसका उपयोग डॉक्टरी सलाह पर हीँ किया जा सकता है ! साथ हीँ कम्पनी यह लिखना भी नही भूली है कि यह गोली गर्भपात की गोली नही है. भारत मेँ जहाँ नाम भर लिख लेने वालो को सक्षर मान लिया जाता है , वहाँ शिक्षा का प्रतिशत मात्र 64% है . ऐसे मेँ उन्हे अच्छा-बुरा कौन समझाएगा.

हलांकि इस विषय पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है पर बेशर्मी की हद पार चुके व्यपार जगत से ज्यादा गुस्सा देश को दशा देने का दावा करने वाले न्यूज़ चैनल और अखाबारोँ मेँ इसके विज्ञापन को देख कर आता है . क्या दिखा रहेँ है यह लोग , अनचाहे गर्भ से मुक्ति दिलाने वाली गोलियोँ का विज्ञापन?

” मैँ अभी प्रेगनेंट नही होना चाहती हूँ – ” की पंच लाइन के साथ कल रात भूल हो गई? गोली खाइये और भूल से छुटकारा. और ऐसी गोलियाँ हैँ , तो डर किस बात का ? करिये भूल और अनचाहे गर्भ से मुक्ति ! क्या बेच रहे हो ? अनचाहे गर्भ से मुक्ति की गारंटी? क्या सिखा रहे हो ? – उन्मुक्त यौनाचार !

आज यह पिल्स युवाओँ की जरूरत बनती जा रही हैँ , इस पिल्स का मीडिया मेँ किया गया धुआँधार प्रचार जिसके कारण आज इस मॉर्निँग पिल्स का इस्तेमाल पार्ंपरिक गर्भ निरोधक के रूप मेँ किया जा रहा है . इसके कई दुष्प्रभाव हैँ . कम्पनी के अनुसार 72 घंटे के अनदर इस पिल्स का सेवन कर अनचाहे गर्भ से मुक्ति पाई जा सकती है. गोली लेनी से प्रेगनेंट होने की सम्भावना 69% तक घट जाती है . देखा गया है कि आजकल की कामकाजी महिलायेँ , इन पिल्स का बेखौफ और लापरवाही के साथ गर्भनिरोधक के रूप मेँ इस्तेमाल कर रही हैँ . यदि रोजाना सेक्स का आनन्द लेता है या लेना चाहता है तो इमरजेंसी पिल्स का सेवन ना करे. यह पिल्स एच. आई. वी से भी रक्षा नही करती . यह पिल्स कंडोम या बर्थ कंडोम की तरह नही है .

अनचाहे गर्भ से छुटकारा पाने के लिए अविवाहित लडकियाँ भी इस्तेमाल करने लगी हैँ . लड्कियाँ इसे एबार्शन पिल्स की तरह इस्तेमाल करती हैँ . सम्बन्ध बनाने के अगले दिन वह बेधडक इस पिल्स को खा लेती हैँ . जैसे रात को कुछ हुआ हीँ न हो , बस एक भूल के अलावा!

टी वी और मीडिया हमे एड्वांस बना रहे हैँ. और दवाई कम्पनियाँ अपना मुनाफा देख रहीँ है, अब ऐसे विज्ञापन आने पर अगर अपने पिता के साथ बैठी हो तो टी वी बन्द करने की जरूरत नही. अब आप देखिए खुशी से कल रात भूल करने और प्रेगनेंट नही होने के नुस्खे !

भारत में आतंक क्यों


भारत में आतंक क्यों ?
Published on February 2, 2011 by जिस तरह से वर्षाऋतु में पानी बरसता है और पूरी प्रकृति का रंग हरियाली के रूप में बदल जाता है। क्योंकि पानी वृक्षों के लिये वरदान साबित होता है। और वह फलने फूलने लगता है। और उनसे असिमित फल, स्वच्छ हवा और न जाने क्या – क्या हम पृथ्वी पर निवासरत् जीवों को प्राप्त होता है। उसमें भी मनुष्य तो उसमें से बहुत बड़ा भाग अपने लिये प्रकृति से छीन लेता है। क्योंकि मनुष्य हमेशा अन्य जीवों से आगे ही रहता आया है और हमेशा रहेगा।

यहां यह लिखकर में आपका ध्यान इस ओर लाना चाहता हूँ कि अगर कहीं पर अमृत की वर्षा होती है तो सभी को अमृत्व ही प्राप्त होता है आपको विष प्राप्त हो संभव नजर नही आता है। इसी प्रकार यदि आप भारत देश में रहने वाले समस्त लोग चाहे वह किसी भी मजहब के हो उन पर अपने चारों ओर चल रहे अच्छे या बुरे वातावरण का प्रभाव निश्चित रूप से पड़ता है चाहे वह कम या ज्यादा, उसकी मानसिक स्थिति पर अवश्य ही सही या गलत प्रभाव पड़ता ही है और अगर ऐंसा नही होता है तो वह अपवादस्वरूप ही हो सकता है। जिस तरह से पिछले कुछ समय में समझौता ब्लास्ट, अजमेर ब्लास्ट में नये नाम सामने आये जिसकी अभी जांच चल रही है। मैं यह नही कहता कि यह लोग सही है अगर इन्होने गलत काम किया है तो निश्चित रूप से इन्हे सजा मिलनी चाहिये, जिससे कि आगे आंतक फैलाने वालों के मन में दहसत फैल सके। पर मेंरा सवाल यह है कि, ऐंसा क्या कारण है कि इतने प्रयास करने के बावजूद आतंक पनप रहा है। वो भी भारत में। इसके लिये मेंने उपरोक्त उदाहरन दिया है वर्षाऋतु का कि अमृत बरसेगा तो अमृत ही प्राप्त होगा।

इसी तरह से इस देश ने बहुत गुलामी झेली जिसकी वजह से आज तक हम पश्चिमी सभ्यता के गुलाम ही है। उसी तरह से हम बहुत समय से पाकिस्तान द्वारा भारत में फैलाये जा रहे आतंक को झेल रहे है, देख रहे है, तो उसका प्रभाव भी कहीं न कही पड़ना निश्चित है यह बात सिद्ध होती है – समझौता ब्लास्ट में नये आरोपी बनाये गये असीमानंद के दिये गये बयान से कि हमने भी बम का जबाव बम से देने की सोची। जरा सोंचे अगर इनसे पहले अगर कोई भी आतंकी घटनाये नही हुई होती या उन पर सरकार कड़ी कार्यवाही करती तो क्या असीमानंद के मन में कभी यह सवाल उपजता कि हमें भी बम का जबाव बम से देना चाहिये, जैसे अन्य आतंकवादी भारत में आतंक फैला रहे है वैसे ही हमें भी इन आतंकियों को उन्ही की भाषा में जबाव देना चाहिये। तो यह नया आतंक पनपता क्या ? सोचने वाला विषय है। मैं असीमानंद को सही नही ठहरा रहा, हमेशा बुरा कार्य बुरा ही होता है चाहे वह किसी भी रूप में क्यों न हो। और इसमें हमारी सरकार और नेता कहीं न कहीं अपने वोट बैंक बढ़ाने के के उद्वेश्य से इन आंतकियों का हौसला बढाते है। क्योंकि आंतकियों को पकड़े जाने पर भी यहाँ की सरकार कुछ नही करती है उदाहरण स्वरूप अफजल को आज तक फांसी नही दी गई है। क्योंकि आज हम लगभग कोई न कोई ऐसी घटना सुनते है कि फला जगह ब्लास्ट हुआ है उसमें इतने लोग मारे गये, फला जगह बलात्कार हुआ है, फला जगह यह हुआ है वो हुआ है। और मन ही मन उन्हे बुरा कहते है कि यह कैसे लोग है जो बुरा काम करने से बिल्कुल नही डरते है। पर फिर भी करते है। जरा इस विषय में गहराई मे जाकर देखों तो निकलकर आयेगा की कहीं न कही हमारी देश की सरकार द्वारा कोई ठोस कदम नही उठाये जा रहे है और न ही कोई ठोस कानून बनाया गया है। जिससे यह बुरे लोग बुरा काम करने से भयभीत हों, बल्कि कोई आतंकवादी पकड़ा भी जाता है तो उसकी बड़े ही अच्छे तरह से यहाँ की सरकार हिफाजत करती है, मेहमाननमाजी करती है और तो और कसाब तथा अफजल जैसे आतंकियों से यहाँ के नेता और मंत्री इसलिये मिलने जाते है कि उन्हे जैल में कोई तकलीफ तो नही है। तथा इन्ही नेताओं में से कोई -कोई नेता तो इन आंतकियों के परिवार वालों के घर भी जाते है और उन्हे हरसंभव मदद देने की वकालत तक करते है, तथा वोट के लिये अनर्गल बयान देकर हमेशा मीडिया में बने रहते है, तो फिर क्यों नही देश में आतंक की जड़े पनपेंगी।

Writer: Ram Prajapati | Vicharmimansa

महंगी चिकित्सा और मरते गरीब

महंगी चिकित्सा और मरते गरीब
आज के दौर में अलग-अलग रोगों के लिए निजी अस्पतालों की पूरे देश में बाढ़-सी आ गई, पर इनमें इलाज कितना अच्छा हो रहा है, उसकी पड़ताल आवश्यक है। यह भी देखने में आया है कि इन अस्पतालों में इलाज कराना आम जनता के बस की बात नहीं है। दूसरी ओर, सरकारी अस्पतालों की दिनोंदिन खस्ता होती हालत से इलाज के अभाव में गरीब जल्द ही इस दुनिया से विदा ले रहा है। ऐसे भी निजी अस्पताल देखे गए, जहां धन के अभाव में गरीब अपना इलाज पूरा नहीं करवा सका और वहीं मृत्यु का शिकार हुआ। कई बार मृत शरीर को अस्पताल से छुड़ाने के लिए भी पैसे नहीं होते।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की 2010 की रिपोर्ट अभी पुरानी नहीं पड़ी है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने भी अपनी रिपोर्ट जारी की है, जिसमें यूनिवर्सल हेल्थ केयर सिस्टम की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। पांच वर्ष पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन ने घोषणा की थी कि वर्ष 2020 तक स्वास्थ्य सेवाएं सबके लिए उपलब्ध हो जाएंगी।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े में कहा गया है कि दुनिया भर में एक अरब लोग आज की तारीख में स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित हैं, जबकि दस करोड़ लोग हर साल गरीबी की ओर धकेले जा रहे हैं। भारी मेडिकल बिलों का भुगतान न कर पाने के कारण सब कुछ दांव पर लगाकर लोग घोर गरीबी की अवस्था में पहुंच रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक मार्गरेट चान ने घोषणा की थी कि 2010 से बहुत सारे देशों को यूनिवर्सल हेल्थ केयर के भीतर लाया जाएगा। इस संगठन के संविधान के मुताबिक, प्राथमिक स्वास्थ्य की सुविधा हासिल करना मनुष्य का मौलिक अधिकार है, जिसकी रक्षा करना हर सरकार का कर्तव्य है।
इस रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया के सभी देशों को, चाहे वे गरीब हों या अमीर, यूनिवर्सल हेल्थ केयर पर ध्यान देना चाहिए। चूंकि इसके लिए अतिरिक्त धन की आवश्यकता है, इसलिए सरकारें नई कर लगा सकती हैं, ताकि स्वास्थ्य सेवाओं के लिए फंड इकट्ठा किया जा सके।
रिपोर्ट में स्वास्थ्य सेवाओं को सुधारने के लिए अधिक फंड उगाहने और वित्तीय अवरोधों को घटाने पर जोर दिया गया है। इसमें बताया गया है कि 20 से 40 प्रतिशत धन बिना वजह दवाओं में खर्च होता है। ऐसा अस्पतालों की अक्षमताओं के कारण होता है।
दूसरी ओर, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की जो वार्षिक रिपोर्ट विगत सितंबर में जारी हुई है, उसमें स्वास्थ्य के क्षेत्र में भारत की उपलब्धियां गिनाई गई हैं। इसमें औसत उम्र में वृद्धि और बच्चों व माताओं की मृत्यु दर में कमी को रेखांकित किया गया है। उल्लेखनीय है कि देश में औसत उम्र बढ़कर 63.5 वर्ष हो गई है, जबकि शिशु मृत्यु दर घटकर प्रति 1,000 पर 53, और माताओं की मृत्यु दर कम होकर प्रति एक लाख में 254 रह गई है। हालांकि शहरी भारत में जातिगत आधार पर लिंगानुपात में असंतुलन बताया गया है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में वर्ष 2005 में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन शुरू किया गया। इसे देश के 18 राज्यों में पहले शुरू किया गया।
निजी अस्पतालों का आज भले ही पूरे देश में दबदबा है, लेकिन निजी मेडिकल केयर का सहयोग उत्साहवर्द्धक नहीं है। रिपोर्ट बताती है कि आजादी मिलने के दौरान चिकित्सा क्षेत्र में निजी क्षेत्र का हस्तक्षेप महज आठ प्रतिशत था, जो आज बढ़कर 80 प्रतिशत हो गया है। मेडिकल की शिक्षा, प्रशिक्षण, मेडिकल तकनीकी और दवाओं पर नियंत्रण से लेकर अस्पतालों के निर्माण और चिकित्सा सेवाएं देने तक निजी क्षेत्र का बोलबाला है। लगभग 75 प्रतिशत से अधिक मानव संसाधन और उन्नत तकनीकी इसी के पास है। आज निजी क्षेत्र में देश के कुल अस्पतालों के 68 प्रतिशत अस्पताल हैं। हालांकि चिकित्सा क्षेत्र में निजी क्षेत्र का यह वर्चस्व अधिकांशत: शहरी क्षेत्रों में ही है।
निजी क्षेत्र के वर्चस्व का एक चिंतनीय पक्ष यह भी है कि सरकारी अस्पतालों की हालत निरंतर बिगड़ती जा रही है। मेडिकल पर्यटन पर भी इसका उलटा असर देखने में आ रहा है। पिछले दो दशकों से देश के अधिकांश राज्यों में अच्छी स्वास्थ्य सेवा सपना हो गई है। आज यदि स्वास्थ्य सेवाओं को दुरुस्त करना है, तो सार्वजनिक क्षेत्र की स्थिति सुधारनी होगी। ग्रामीण भारत तभी स्वस्थ रहेगा, जब सरकारी चिकित्सा सुविधाएं चाक-चौबंद हों।
भगवती प्रसाद डोभाल

पत्रकारिता के मिशन को कोई नहीं रोक सकता

पत्रकारिता के मिशन को कोई नहीं रोक सकता


वाराणसी। सूचना तकनीक और उच्च संसाधनों से आज का पत्रकार अधिक शक्तिशाली हुआ है। लेकिन, चारों ओर भ्रष्टाचार का बोलबाला होने से उसके समक्ष चुनौतियां भी बढ़ी हैं। इसके बावजूद पत्रकारिता के मिशन को कोई नहीं रोक सकता। ये बातें शनिवार को काशी विद्यापीठ में शुरू हुई सात दिनी कार्यशाला में बतौर मुख्य अतिथि पूर्व सांसद डा. रत्नाकर पांडेय ने कहीं।
विश्वविद्यालय के जनसंचार विभाग और पब्लिक रिलेशन सोसाइटी आफ इंडिया (पीआरएसआई) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित कार्यशाला का विषय है जनसंपर्क एवं पत्रकारिता। विभागाध्यक्ष एवं संयोजक डा. अनिल कुमार उपाध्याय ने विषय प्रस्तावना पेश की। बतौर विशिष्ट अतिथि अमर उजाला के स्थानीय संपादक डा. तीर विजय सिंह ने भी स्वीकार किया कि पत्रकारिता व्यावसायिक हुई है, लेकिन उसका उद्देश्य आज भी वही है। तब आजादी के लिए पत्रकार लड़ता था और आज भ्रष्टाचार आदि के खिलाफ। उन्होंने विद्यार्थियों को जनसंपर्क और पत्रकारिता की कार्यशैली समझाते हुए कहा कि पीआरओ के लिए कौशल एवं वाकपटुता और पत्रकार के लिए विचार का होना बहुत जरूरी है। आकाशवाणी एवं दूरदर्शन के पूर्व एडिशनल डायरेक्टर प्रो. एमपी लेले ने बतौर विशिष्ट अतिथि कहा कि पत्रकारिता के क्षेत्र में संभावनाएं अनंत हैं, लेकिन गुण और संस्कारों को बचाना होगा।
मदन मोहन मालवीय हिंदी पत्रकारिता संस्थान संकाय के अध्यक्ष प्रो. राम मोहन पाठक ने कहा कि धन के आधार पर किया गया संपर्क जनसंपर्क नहीं होता। चरित्र और सिद्धांत पर आधारित संपर्क होना चाहिए। अध्यक्षता मानवीय संकाय के अध्यक्ष प्रो. अजीज हैदर ने की। इसके पूर्व अंगवस्त्रम् एवं स्मृति चिह्न भेंटकर अतिथियों का स्वागत किया गया। संचालन डा. विनोद कुमार सिंह एवं धन्यवाद ज्ञापन नरेश मेहता ने किया। अमिताभ भट्टाचार्य, प्रदीप उपाध्याय समेत कई वरिष्ठ पत्रकार, अध्यापक एवं विद्यार्थी मौजूद रहे। तकनीकी सत्र में विशेषज्ञों ने छात्र-छात्राओं को व्यावहारिक ज्ञान दिया।

Wednesday, 2 February 2011

राजनीति की नीति को खोल देना ही विकीलीक्‍स का काम था,

आप के चिन्‍तन को आमन्‍त्रण देता हूँ, श्रीमान्‌ कि क्‍या सच की जानकारी केवल एक हंगामे की कोशिश है। क्‍या अमेरिका जैसी महाशक्‍ति को एक मामूली वेबसाइट इतना डरा सकती है कि उसके निर्माता को जेल में डालने की कोशिश की जाये। असांजे ने एक वेबसाइट के माध्‍यम से दुनिया के हुक्‍मरानों को आईना क्‍या दिखाया पूरी दुनिया में आफत सी आ गई, जब कि वो केवल सच्‍चाई को जनता के सामने रख रहा है। पर्दाफाश करना, पोल खोलना, गोपनीयता को भंग करना आदि ऐसे ही शब्‍द है जो राजनीति, कूटनीति में हमेशा से चलते रहे हैं।

राजनीति की नीति को खोल देना ही विकीलीक्‍स का काम था, पर ताकतवर दुनिया यह सब क्‍यों सहन करे, उठाओं और सच के सिपाही को जेल में डाल दो। अमेरिका, यूरोप, एशिया के सभी प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति इस खुलासे से हैरान, परेशान हो रहे है सच का सामना करना बहुत मुश्‍किल हो गया है। अमेरिका में पाखण्‍ड ढूंढना वैसे ही बहुत आसान है और पाखण्‍डों के पर्व में सचाई की किरण किसे सुहाती है।

पूरी दुनिया में झूठ बोलना एक कला है और सरकारें, राजनेता, राजनयिक तथा अफसर झूठ बोलने, बात बदलने में माहिर होते है, लेकिन जब मूल दस्‍तावेज ही जनता के सामने कोई असांजे प्रस्‍तुत कर देता है तो मुंह छिपाने की जगह नहीं मिलती है। सरकारें चाहे तो लापरवाही के लिए किसी छुटभैये की बलि ले सकती है मगर इससे क्‍या होने वाला है।

राजनीति के दलदल में असांजे एक कोमल पवित्र विचार की तरह है, असांजे की हत्‍या कर सकते हैं, मगर इस विचार की हत्‍या कैसे होगी जो आम जनता तक पहुँच गया है। सच की खोज का विचार, तथ्‍यों को आम आदमी तक पहुँचाने का विचार। सच दिखाने की एक कीमत देनी पड़ती है। गेलिलियों को फांसी पर चढ़ाने से पृथ्‍वी सूर्य के चारों ओर चक्‍कर लगाना बन्‍द नहीं कर देती अर्थात सत्‍य को दबाना हकीकत को दबाना पत्रकारिता के इन्‍टरनेटी युग में संभव नहीं। राजनीति में सफलता के दस बाप हो जाते है और असफलता अवैध सन्‍तान की तरह मारी मारी फिरती है। हर बार सरकारी खिड़कियों से हवा, रोशनी नहीं आती कई बार सरकारी दरवाजों, खिड़कियों से अन्‍धेरा भी आता है। कोहरा भी आता है, और हर बार कोहरे को साफ करने के लिए आईने के सामने खड़ा होना आवश्‍यक हो जाता है।

मत कहो कि राजा नंगा है। उसने सोने की पारदर्शी पोशाक पहन रखी है। यारों सरकारें गाल बजाने से नहीं चलती। सरकारें धक्‍के या ठेले से भी नहीं चलती, सरकारें तो बस डण्‍डे से चलती है। एक भ्रष्ट व्‍यवस्‍था में फंसा ईमानदार व्‍यक्‍ति क्‍या कर सकता है। वैसे भी निष्क्रिय ईमानदार से सक्रिय बेईमान को जनता और व्‍यवस्‍था दोनों पसंद करते हैं। शायर का कहना बिलकुल सही है-

मत कहो कि आकाश में कोहरा घना है।

यह किसी की व्‍यक्‍तिगत आलोचना है॥

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यशवन्‍त कोठारी,

86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर,

जयपुर - 2

फोन – 2670596

ykkothari3@gmail.com

मो․․09414461207

अरुणोदय-अदिति ने मल्लिका के चुंबनों का रिकार्ड तोड़ा


'ख्वाहिश' में 17 किस करने वाली मल्लिका शेरावत का रिकार्ड तोड़ते हुए सुधीर मिश्रा का नई फिल्म 'ये साली जिंदगी में' में अरुणोदय सिंह और अदिति राव ने 24 बार चुंबन के दृश्य दिए हैं।

अदिति राव इससे पहले 'दिल्ली 6' में और कांग्रेस नेता अर्जुन सिंह के पोते अरुणोदय सिंह 'मिर्च' और 'आयशा' में नजर आ चुके हैं। फिल्म के निर्देशक सुधीर मिश्रा बताते हैं कि अरुणोदय और अदिति एक युवा प्रेमी जोड़े की भूमिका में हैं। जो दिल्ली में रहते हैं और खूब झगड़ते हैं और झगड़ने के बाद हर बार एक-दूसरे को किस करते हैं। सुधीर कहते हैं सबसे अच्छी बात ये है कि ये दोनों झगड़ते बहुत हैं।

सुधीर का कहना है कि वो अपनी फिल्म में प्रेमी जोड़े को चुंबन लेते हुए दिखाना पसंद करते हैं बजाय उन्हें किसी आईटम नम्बर में डांस करवाने के। अरुणोदय सिंह राजनेता अर्जुन सिंह के पोते हैं और अदिति राव एक्टर सत्यदीप मिश्रा की पत्नी हैं।

नित्यानंद स्वामी ने प्रेस कांफ्रेंस कर खुद को बताया पाक-साफ


बेंगलुरू | सेक्स गुरू के नाम से मशहूर हो गए नित्यानंद स्वामी इस समय कर्नाटक स्थित अपने बिदाड़ी आश्रम से एक बड़ी प्रेस कांफ्रेंस को संबोधित कर रहे हैं। नित्यानंद स्वामी ने दक्षिण भारतीय अभिनेत्री रंजीता के साथ पेश की गई अपनी सीडी को नकली बताया है और अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को सरासर गलत बता

नित्यानंद ने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहाकि पूरी दुनिया में मेरे एक करोड़ से ऊपर श्रद्धालु हैं। इसके बावजूद मुझे एक सीडी के जरिए ना केवल धमकाया जा रहा है बल्कि ब्लैकमेल भी किया जा रहा है। नित्यानंद ने अपनी महिला श्रद्धालुओं के यौन उत्पीड़न के सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहाकि वह पूरी तरह से निर्दोष हैं और किसी ने उन्हे ब्लैकमेल करने के लिए इतने बड़े षड़यंत्र का शिकार बनाया है।

नित्यानंद ने इस आरोप को भी गलत ठहराया कि उन्होने कभी अपनी श्रद्धालुओं को सम्मोहित कर उनका यौन शोषण किया है। नित्यानंद ने अपने करोड़ों समर्थकों को अपना साथ देने के लिए धन्यवाद दिया। नित्यानंद ने ये भी कहाकि वह जल्द ही खुद को निर्दोष साबित करने के लिए और अपने श्रद्धालुओं को अपने पक्ष में खड़ा करने के लिए पूरे देश में यात्रा करेंगे। उनकी ये यात्रा तमिलनाडु के कन्याकुमारी से उत्तर भारत के प्रमुख राज्य बिहार तक होगी।

आदिवासी कुंभ से क्या हासिल होगा आरएसएस को


लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं। संपर्कः अध्यक्ष, जनसंचार विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, प्रेस काम्पलेक्स, एमपी नगर, भोपाल (मप्र) मोबाइलः 098935-98888आदिवासियों के मूल सवालों को आखिर कौन उठाएगा

संजय द्विवेदी

मध्यप्रदेश के ईसाई समुदाय एक बार फिर आशंकित है। ये आशंकाएं जायज हैं या नाजायज यह तो नहीं कहा जा सकता किंतु ईसाई संगठनों के नेताओं ने पिछले दिनों प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह से मिलकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वारा 10,11,12 फरवरी को मंडला में आयोजित किए जा रहे मां नर्मदा सामाजिक कुंभ को लेकर अपनी आशंकाएं जतायी हैं। इस आयोजन में लगभग 20 लाख लोगों के शामिल होने की संभावना है। इसके चलते ही वहां के ईसाई समुदाय में भय व्याप्त है। मंडला वह इलाका है जहां बड़े पैमाने पर धर्मांतरण हुआ है, ईसाई संगठनों को आशंका है इस आयोजन के बहाने संघ परिवार के लोग उनके लोगों को आतंकित कर सकते हैं, या उन्हें पुनः स्वधर्म में वापसी के लिए दबाव बना सकते हैं।जाहिर तौर इससे इस क्षेत्र में एक सामाजिक तनाव फैलने का खतरा जरूर है।

यह भी सवाल काबिलेगौर है कि आखिर इस कुंभ के लिए मंडला का चयन क्यों किया गया। इसके उत्तर बहुत साफ हैं एक तो मंडला आदिवासी बहुल जिला है और इस इलाके धर्मांतरित लोगों की संख्या बहुत है। किंतु ईसाई संगठनों की चिंताओं को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता। संघ परिवार ने इस आयोजन के ताकत झोंक दी है किंतु इतने बड़े आयोजन में जहां लगभग २० लाख लोगों के आने की संभावना है आदिवासी समाज के वास्तविक सवालों को संबोधित क्यों नहीं किया जा रहा है, यह एक बड़ा सवाल है। आदिवासियों की जिंदगी का मूल प्रश्न है आज उनकी जमीनों,जंगलों और जड़ों से उनका विस्थापन। इसी के साथ नक्सलवाद की आसुरी समस्या समस्या उनके सामने खड़ी है। इस बाजारवादी समय में अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहे इस समाज के मूल प्रश्नों सें हटकर आखिर धर्मांतरण जैसे सवालों से हम क्या हासिल करना चाहते हैं? क्या ही बेहतर होता कि संघ परिवार इस महाआयोजन के बहाने माओवादी आतंकवाद के खिलाफ एक संकल्प पारित करता और जल, जंगल,जमीन से आदिवासियों की बेदखली के खिलाफ कुछ सार्थक फैसले लेते। किंतु लगता है कि धर्मांतरण जैसे सवालों को उठाने में उसे कुछ ज्यादा ही आनंद आता है।

धर्मान्तरण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार की कुछ उन प्राथमिक चिंताओं में है जो उसके प्रमुख एजेंडे पर है। यह दुख कहीं-कहीं हिंसक रूप भी ले लेता है, तो कहीं गिरिजनों और आदिवासियों के बीच जाकर काम करने की प्रेरणा का आधार भी देता है। आज ईसाई मिशनरियों की तरह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रेरित वनवासी कल्याण आश्रम और सेवाभारती जैसे संगठनों के कार्यकर्ता आपको आदिवासियों, गिरिजनों एवं वंचितों के बीच कार्य करते दिख जाएंगे ।बात सिर्फ सेवा को लेकर लगी होड़ की होती तो शायद इस पूरे चित्र हिंसा को जगह नहीं मिलती । लेकिन ‘धर्म’ बदलने का जुनून और अपने धर्म बंधुओं की तादाद बढ़ाने की होड़ ने ‘सेवा’ के इन सारे उपक्रमों की व्यर्थता साबित कर दी है। हालांकि ईसाई मिशनों से जुड़े लोग इस बात से इनकार करते हैं कि उनकी सेवाभावना के साथ जबरिया धर्मान्तरण का लोभ भी जुड़ा है। किंतु विहिप और संघ परिवार इनके तर्कों को खारिज करता है। आज धर्मान्तरण की यह बहस ऐसे मोड़ पर पहुंच चुकी है, जहां सिर्फ तलवारें भांजी जा रही हैं। और तर्क तथा शब्द अपना महत्व खो चुके हैं। जिन राज्यों में व्यापक पैमाने पर धर्मान्तरण हुआ है मसलन मिजोरम, अरुणाचल, मेंघालय, नागालैंड के ताजा हालात तथा कश्मीर में मुस्लिम बहुसंख्या के नाते उत्पन्न परिस्थितियों ने हिंदू संगठनों को इन बातों के लिए आधार मौजूद कराया है कि धर्म के साथ राष्ट्रांतरण की भी परिस्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं। जाहिर है यह भयग्रंथि ‘हिंदू मानस’ में एक भय का वातारण बनाती है। इन निष्कर्षों की स्वीवकार्यता का फलितार्थ हम उड़ीसा की ‘दारा सिंह परिघटना’ के रूप में देख चुके हैं। दारा सिंह इसी हिंदूवादी प्रतिवादी प्रतिक्रिया का चरम है।

धर्मान्तरण की यह प्रक्रिया और इसके पूर्वापर पर नजर डालें तो इतिहास के तमाम महापुरुषों ने अपना धर्म बदला था। उस समय लोग अपनी कुछ मान्यताओं, आस्थाओं और मानदंडों के चलते धर्म परिवर्तन किया करते थे। वे किसी धर्म की शरण में जाते थे या किसी नए पंथ या धर्म की स्थापना करते थे। लंबे विमर्शों, बहसों और चिंतन के बाद यथास्थिति को तोड़ने की अनुगूंज इन कदमों में दिखती थी। गौतम बुद्ध, महावीर द्वारा नए मार्गों की तलाश इसी कोशिश का हिस्सा था वहा भी एक विद्रोह था। बाद में यह हस्तक्षेप हमें आर्य समाज, ब्रह्मा समाज, रामकृष्ण मिशन जैसे आंदोलनों में दिखता है। धर्म के परंपरागत ढांचे को तोड़कर कुछ नया जोड़ने और रचने की प्रक्रिया इससे जन्म लेती थी। कलिंग युद्ध के बाद सम्राट अशोक का बौद्ध धर्म स्वीकारना, एक लालच या राजनीति से उपजा फैसला नहीं था। यह एक व्यक्ति के हृदय और धर्म परिवर्तन की घटना है, उसके द्वारा की गई हिंसा के ग्लानि से उपजा फैसला है। बाद के दिनों में बाबा साहब भीमराव आम्बेडकर का बौद्ध धर्म स्वीकारना एक लंबी विचार-प्रक्रिया से उपजा फैसला था। इसी प्रकार केशवचंद्र सेन भी ईसाई धर्म में शामिल हो गए थे। उदाहरण इस बात के भी मिलते हैं कि शुरुआती दौर के कई ईसाई धर्म प्रचारक ब्रह्माण पुजारी बन गए। कुछ पादरी ब्राह्मण पुजारियों की तरह कहने लगे । इस तरह भारतीय समाज में धर्मातरण का यह लंबा दौर विचारों के बदलाव के कारण होता रहा । सो यह टकराव का कारण नहीं बना । लेकिन सन 1981 में मीनाक्षीपुरम में 300 दलितों द्वारा हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम ग्रहण करने की घटना ने एक बड़ा रूप ले लिए । सामंतों और बड़ी जातियों के अत्याचार से संतप्त जनों की इस प्रतिक्रिया ने कथित हिंदूवादियों के कान खड़े कर दिए। सही अर्थों में मीनाक्षीपुरम की घटना आजाद भारत में धर्मान्तरण की बहस को एक नया रूप देने में सफल रही । इसने न सिर्फ हमारी सड़ांध मारती जाति-व्यवस्था के खिलाफ रोष को अभिव्यक्त दी वरन हिंदू संगठनों के सामने यह चुनौती दी कि यदि धार्मिक-जातीय कट्टरता के माहौल को कम न किया गया तो ऐसे विद्रोह स्थान-स्थान पर खड़े हो सकते हैं। इसी समय के आसपास महाराष्ट्र में करीब 3 लाख दलितों ने हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपना लिया । 26 जनवरी 1999 को तेजीपुर (उ.प्र.) में कई दलित काश्तकारों ने बौद्ध धर्म अपना लिया । लेकिन इन घटनाओं को इसलिए संघ परिवार ने इतना तूल नहीं दिया, क्योंकि वे बौद्धों को अलग नहीं मानते । लेकिन मिशनरियों द्वारा किए जा रहे धर्मान्तरण की कुछेक घटनाओं ने उन्हें चौकस कर दिया । संघ परिवार ने धर्म बदल चुके आदिवासियों को वापस स्वधर्म में लाने की मुहिम शुरू की, जिसमें दिलीप सिंह जूदेव जैसे नेता आगे आए।

इस सबके साथ ईसाई मिशनों की तरह संघ परिवार ने भी सेवा के काम शुरू किए। इससे बिहार के झारखंड, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, गुजरात, महाराष्ट्र के कुछ क्षेत्रों में जमीनी संघर्ष की घटनाएं बढ़ी । जिसकी परिणति कई प्रदेशों में हिंसक संघर्ष रूप में सामने आई । कुछ समय पहले इसका इस्तेमाल कर पाक प्रेरित आतंकियों ने भी हिंदू-ईसाई वैमनस्य फैलाने के लिए चर्चों में विस्फोट कराए थे। इन तत्वों की पहचान दीनदार अंजमुन के कार्यकर्ताओं के रूप में हो चुकी है। पूर्वाचल के राज्यों में आईएसआई प्रेरित आतंकियों से चर्च के रिश्ते भी प्रकाश में आए हैं। ऐसे एकाध उदाहरण भी देश के सद्भाव व सह अस्तित्व की विरासत को चोट पहुंचाने के लिए काफी होते हैं। जाहिर है ऐसे संवेदनशील प्रश्नों पर नारेबाजियों के बजाए ठंडे दिमाग से काम लेना चाहिए। लेकिन भारत जैसे विशाल देश में जहां साक्षरता के हालात बदतर हैं, लोग भावनात्मक नारों के प्रभाव में आसानी से आ जाते हैं। जरूरत इस बात की है कि हिंदू समाज धर्मान्तरण के कारकों एवं कारणों का हल स्वयं में ही खोजे। धर्म परिवर्तन प्रत्येक व्यक्ति का बुनियादी हक है। कोई भी व्यक्ति का यह हक उससे ले नहीं सकता, लेकिन इस प्रश्न से पीड़ित जनों को चाहिए कि वे लड़ाई हिंदू समाज में पसरी अमानवीय जाति प्रथा और पाखंडपूर्ण बहुरूपिएपन के खिलाफ शुरू करें। समाज को जोड़ने, उसमें समरसता घोलने का दायित्व बहुसंख्यक समाज और उसके नेतृत्व का दावा करने वालों पर है। सामाजिक विषमता के दानव के खिलाफ यह जंग जितनी तेज होती जाएगी। धर्मान्तरण जैसे प्रश्न जिनके मूल में अपमान ,तिरस्कार, उपेक्षा और शोषण है, स्वतः समाप्त करने के बजाए वंचितों के दुख-दर्द से भी वास्ता जोड़ना जाहिए। इस सवाल पर बहुसंख्यक समाज को सकारात्मक रुख अपनाकर बतौर चुनौती इसे स्वीकारना भी चाहिए। जाहिर है इस लड़ाई को दारा सिंह के तरीके से नहीं जीता जा सकता । इसके दो ही मंत्र हैं सेवा और सद्भाव। २० लाख लोगों को मंडला में जुटाकर आरएसएस अगर आदिवासियों के मूल सवालों पर बात नहीं करता तो अकेले धर्मांतरण का सवाल इस कुंभ को सार्थक तो नहीं बनाएगा।

ईसाई धर्म और नारी मुक्ति


ईसाई धर्म और नारी मुक्ति


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प्रो. कुसुमलता केडिया
क्रिश्चिएनिटी की जिन मान्यताओं के विरोध में यूरोपीय नारी मुक्ति आंदोलन वीरतापूर्वक खड़ा हुआ, वे मान्यताएं हिन्दू धर्म, बौध्द धर्म तथा विश्व के सभी धर्मों में कभी थी ही नहीं। यहां तक कि यहूदी धर्म और इस्लाम में भी ये मान्यताएं कभी भी नहीं थीं। भले ही स्त्रियों पर अनेक प्रतिबंध इस्लाम में हैं परन्तु ऐसी भयंकर मान्यताएं वहां भी नहीं हैं।

भारत में भी नारी मुक्ति का एक आंदोलन चल रहा है। इसके भी अधिकांश स्वर वैसे ही दिखते हैं, जैसे यूरोपीय स्त्री आंदोलन के दिखते हैं। परन्तु यह दिखाई पड़ना केवल ऊपरी है, आकारगत है। तत्व की दृष्टि से दोनों में बड़ा अंतर है। यूरोपीय स्त्री आंदोलन लगभग एक हजार वर्षों के यूरोपीय इतिहास से अभिन्नता से जुड़ा है। भारत यूरोपीय राजनीति से, जो आज एक तरह से वैश्विक राजनीति भी है, घनिष्ठता से जुड़ा है। भारत में राजनीति करने वाले लोगों के मन में यूरोपीय, अमेरिकी राजनैतिक विचारों तथा राजनैतिक संस्थाओं के प्रति श्रध्दा एवं प्रणाम की भावना है और इसी कारण से वहां की एकेडमिक्स के प्रति भी श्रध्दा और प्रणाम भावना है। अत: यहां राजनैतिक दृष्टि से सक्रिय लोगों में नारी मुक्ति के संदर्भ में भी यूरोपीय नारी मुक्ति आंदोलन के प्रत्ययों, नारों, मान्यताओं और भंगिमाओं का अनुसरण करने का भरपूर प्रयास दिखता है, क्योंकि वैसा करना ही ‘पोलिटिकल करेक्टनेस’ है। यह बात समझ में भी आती है।

वैश्विक मीडिया द्वारा ‘पोलिटिकली करेक्ट’ लोगों और बातों को ही तरजीह मिलेगी, प्रधानता मिलेगी, प्रचार मिलेगा, महत्व मिलेगा, विदेश घूमने और वहां पब्लिसिटी पाने का मौका मिलेगा, जिससे सुख-सुविधा और ‘पावर’ मिलेगी। परन्तु ‘पोलिटिकल करेक्टनेस’ और एकेडमिक स्पष्टता- ये दो अलग-अलग बातें हैं। इनके घालमेल से किसी का भी भला नहीं होगा। एकेडमिक स्पष्टता सम्भव होती है- तथ्यों के संकलन, उनके निष्पक्ष विश्लेषण और ब्यौरेवार प्रस्तुतियों से। इन तीनों से ही समस्याओं का यथातथ्य निरूपण सम्भव होता है। और तब उनके सम्भावित समाधान के रास्ते खुलते हैं। अत: बौध्दिक स्पष्टता के लिए आवश्यक है कि सर्वप्रथम हम यूरोपीय नारी मुक्ति आंदोलन के वास्तविक संदर्भों को जानें। ग्यारहवीं शदी ईस्वी के प्रारंभ तक यूरोप का बड़ा हिस्सा बहुदेवपूजक यानी सनातनधर्मी था। क्रिश्चिएनिटी वहां 7वीं शदी ईस्वी से धीरे-धीरे फैलनी शुरू हुई।

इंग्लैंड में क्रिश्चिएनिटी 7वीं से 11वीं शदी तक क्रमश: फैली। 1066 ई. में जब इंग्लैंड पर नार्मन लोगों ने आक्रमण किया तब पोप की मदद पाने के लिए वहां के शासक सैक्सन लोगों ने क्रिश्चिएनिटी को ‘राजकीय रिलिजन’ स्वीकार कर लिया। इसमें वहां तीन सौ वर्षों से लगातार सक्रिय मिशनरी पादरियों की भूमिका रही। उसके पूर्व 8वीं शताब्दी में प्रफांस के बर्बर प्रहारों से टूटे हुए तत्कालीन कतिपय अंग्रेज शासक समूहों ने भी कुछ समय के लिए क्रिश्चिएनिटी स्वीकार की थी। रोम में क्रिश्चिएनिटी चौथी से छठी शताब्दी ईस्वी के बीच धीरे-धीरे फैली थी। प्रफांस में वह छठी शताब्दी में फैली। स्पेन तथा जर्मनी में छठी और सातवीं, जबकि पोलैंड, रूस, सर्बिया, बोहेमिया, हंगरी, बुल्गारिया, डेनमार्क आदि में 10वीं और 11वीं शताब्दी में, स्वीडन और नार्वे में 12वीं शताब्दी में। प्रशा, फिनलैंड, स्टोनिया, लीवोनिया और स्विट्जरलैंड में 13वीं शताब्दी में ही ईसाईयत फैल पायी। 15वीं शताब्दी ईस्वी से उसका प्रचंड विरोध भी यूरोप में शुरू हो गया। क्योंकि उसकी मूल मान्यताएं ही मानवता-विरोधी थीं। ईसाईयत की मूल मान्यताओं का प्रबल प्रभाव 12वीं से 16वीं शदी ईस्वी तक यूरोप में व्यापक हुआ। इन मान्यताओं और आस्थाओं को जाने बिना यूरोपीय स्त्री मुक्ति आंदोलन के संदर्भों को समझा नहीं जा सकता।

स्त्री-पुरुष सम्बन्धी मूल क्रिश्चियन मान्यताएं मूल क्रिश्चियन मान्यताओं में सबसे महत्वपूर्ण मान्यताएं हैं:-

(1) ‘गॉड’ ने पुरुष (मैन) को अपनी ही ‘इमेज’ में बनाया। अत: यह ‘मैन’ ही समस्त सृष्टि का ‘लॉर्ड’ है। ‘मैन’ को चाहिए कि वह धरती को दबाकर आज्ञाकारिणी और वशवर्ती बना कर रखे तथा उससे खूब आनंद प्राप्त करे।

(2) ‘गॉड’ ने प्रथम ‘मैन’ एडम की एक पसली से स्त्री (ईव) बनाई जो ‘मैन’ के मन-बहलाव के लिए बनाई गई। इस प्रकार स्त्री (ईव या वूमैन) बाद की रचना है। वह ‘मैन’ का केवल एक अंश है जो उसके मन-बहलाव के लिए बनी है।

(3) नर-नारी का परस्पर स्वेच्छा और उल्लास से मिलना ही ‘मूल पाप’ (ओरिजिनल सिन) है। इस ‘ओरिजिनल सिन’ के लिए ‘मैन’ को ‘शैतान’ के कहने पर ‘वूमैन’ ने फुसलाया। इसलिए ‘वूमैन’ ‘शैतान की बेटी’ है। वह पुरुष को सम्मोहित कर ‘मूल पाप’ यानी कामभाव यानी ‘शैतानियत’ के चंगुल में फंसाती है। अत: वह सम्मोहक (सेडयूसर) है। ‘मूल पाप’ में पुरुष को खींचने का जो उसने अनुचित आचरण किया है, उस कारण वह ‘एडल्टरेस’ है, ‘एडल्टरी’ की दोषी है। पुरुष को सम्मोहित करने के ही अर्थ में वह जादूगरनी है। पुरुष को सम्मोहित करना बुरा है, इसलिए वह बुरी जादूगरनी है। अत: डायन (विच) है। उसे यातना देना पुण्य कार्य है।

(4) शैतान ‘गॉड’ का प्रतिस्पर्ध्दी है। ‘गॉड’ और शैतान में निरन्तर युध्द चल रहा है। जीसस की ‘मिनिस्ट्री’ यानी पादरी मंडल लगातार शैतान के साम्राज्य के विरुध्द संघर्षरत है, ताकि अंतत: ‘गॉड’ की जीत हो। शैतान ‘गॉड’ का शत्रु है। शैतान के विरुध्द युध्द करना और युध्द में सब प्रकार के उपाय अपनाना हर आस्थावान क्रिश्चियन का कर्तव्य (रेलिजियस डयूटी) है।

(5) स्त्री को, गैर-क्रिश्चियन सभी पुरुषों को तथा इस धरती को अपने अधीन दबा कर रखना, आज्ञाकारी और वशवर्ती बनाकर रखना हर ‘फेथफुल क्रिश्चियन’ पुरुष का कर्तव्य है और यह कर्तव्य उसे बुध्दि और बल के हर संभव तथा अधिकतम उपयोग के द्वारा करना है।

इन्हीं मूलभूत मान्यताओं के कारण क्रिश्चिएनिटी में ‘क्रिश्चियन स्त्री’ को शताब्दियों तक ‘मैन’ की शत्रु और शैतान की बेटी तथा शैतान का उपकरण माना जाता रहा है। नर-नारी मिलन को ‘मूल पाप’ माना जाता रहा है। इस दृष्टि से विवाह भी वहां ‘पाप’ ही माना जाता रहा है परन्तु वह क्रिश्चियन विधि से होने पर तथा चर्च के नियंत्रण में वैवाहिक जीवन जीने पर अपेक्षाकृत ‘न्यूनतम पाप’ माना जाता रहा। तब भी विवाहित स्त्री को मूलत: ‘अपवित्र’ ही माना जाता है। पवित्र स्त्री तो वह है जो किसी क्रिश्चियन मठ में दीक्षित मठवासिनी अर्थात् ‘नन’ है जिसने गरीबी, ‘चेस्टिटी’ तथा क्रिश्चियन पादरियों और चर्च की आज्ञाकारिता की शपथ ली है।

ननों को हठयोगियों जैसा कठोर शारीरिक तप करना पड़ता है। पादरी ‘सेलिबेट’ यानी अविवाहित होते हैं, जिसका अर्थ गैर-जानकार लोगों ने हिन्दी में ‘ब्रह्मचारी’ कर रखा है जो पूर्णत: गलत है। ‘सेलिबेट’ पादरी ‘नन्स’ के साथ उनके सम्मोहन के कारण प्राय: काम सम्बन्ध बनाते रहे हैं और उसके लिए दोषी भी ‘सेडयूसर’ ‘नन’ को ही माना जाता है।

(6) क्रिश्चिएनिटी की उपर्युक्त पांचों मूल मान्यताओं से जुड़ी एक महत्वपूर्ण छठी मान्यता यह है कि स्त्री ने चूंकि पुरुष को बहला-फुसलाकर ‘मूल पाप’ में फंसाया, अत: ‘गॉड’ ने ‘ईव’ को शाप दिया। इस शाप में मासिक धर्म, प्रसव पीड़ा, गर्भ धारण तथा सदा पुरुष की अधीनता में रहने और दंडित किये जाने आदि का शाप है। कुल सात शापों से स्त्री शापित है। किसी भी भूल पर उसे एक स्वस्थ मर्द के अंगूठे की मोटाई वाले कोड़े से दस से पचास तक कोड़े मारना क्रिश्चियन पुरुष का सहज अधिकार और कर्तव्य है। अपराध गंभीर होने पर सौ या उससे ज्यादा कोड़े पड़ सकते हैं।

(7) क्रिश्चिएनिटी में मातृत्व भी एक अभिशाप है। किसी स्त्री का मां बनना ‘गॉड’ द्वारा उसे दंडित किए जाने का परिणाम है। संतान भी ‘मूल पाप’ का परिणाम होने के कारण वस्तुत: धरती पर पाप का प्रसार ही है। केवल चर्च को समर्पित होने पर व्यक्ति इस ‘पाप’ के भार से इसलिए मुक्त हो जाता है, क्योंकि वह ऐसा करके उस जीसस की शरण में जाता है जिसने ‘क्रास’ पर टंग कर (सूली पर चढ़ कर) एडम और ईव तथा उनकी समस्त संतानों के द्वारा किए गए ‘मूल पापों’ का प्रायश्चित पहले ही सबकी ओर से कर लिया है। जीसस ‘गॉड’ का ‘इकलौता बेटा’ है और केवल उसकी शरण में जाने पर ही मनुष्य ‘पाप’ से मुक्त होता है। ‘पाप’ का यहां मूल अर्थ है ‘ओरिजिनल सिन’ यानी रति सम्बन्ध रूपी पाप जिससे व्यक्ति गर्भ में आता और जन्म लेता है। अत: व्यक्ति जन्म से ही पापी है। क्रिश्चिएनिटी की ये सातों धारणाएं अभूतपूर्व हैं, अद्वितीय हैं। और संसार की कोई भी अन्य सभ्यता इनमें से एक भी मान्यता को नहीं मानती। ये केवल क्रिश्चिएनिटी में मान्य आस्थाएं हैं।

इन अद्वितीय मान्यताओं के कारण पांच सौ वर्षों तक करोड़ों सदाचारिणी क्रिश्चियन स्त्रियों को लगातार दबाया गया, मारा गया, जलाया गया, बलपूर्वक डुबोया गया, खौलते कड़ाह में उबाला गया, घोड़े की पूंछ से बांध कर घसीटा गया। ‘क्रिश्चियन स्त्री’ पर ये अत्याचार किन्हीं लुच्चे-लफंगों, लम्पटों अथवा अनपढ़ या पिछड़े लोगों ने नहीं किया था, किन्हीं अशिक्षित, अल्पशिक्षित या असामाजिक तत्वों ने नहीं किया था अपितु सर्वाधिक शिक्षित, संगठित और प्रभुताशाली क्रिश्चियन भद्रलोक ने किया।

क्रिश्चियन स्त्रियों में भी आत्मा होती है, यह 17वीं शताब्दी के आरंभ तक चर्च द्वारा मान्य नहीं था। स्त्री का स्वतंत्र व्यक्त्तिव तो 20वीं सदी में ही मान्य हुआ। 1929 ई. में इग्लैंड की अदालत ने माना कि स्त्री भी ‘परसन’ है। स्त्रियों में आत्मा होती है, यह यूरोप के विभिन्न देशों में 20वीं शताब्दी में ही मान्य हुआ। 20वीं शताब्दी में ही स्त्रियों को वयस्क मताधिकार वहां पहली बार प्राप्त हुआ। 18वीं शताब्दी तक स्त्रियों को बाइबिल पढ़ने का अधिकार तक मान्य नहीं था। स्त्री को डायन कहकर उनको लाखों की संख्या में 14वीं से 18वीं शताब्दी तक जिन्दा जलाया गया और यातना देकर मारा गया। स्पेन, इटली, पुर्तगाल, हालैंड, इंग्लैंड, प्रफांस, जर्मनी, स्विट्जरलैंड आदि सभी देशों में ये कुकृत्य हुए। इन सब भयंकर मान्यताओं के विरोध में यूरोप में नारी मुक्ति आंदोलन चला जिसमें उन्होंने स्वयं को पुरुषों के समतुल्य माना, अपने भीतर वैसी ही आत्मा और बुध्दि मानी और ‘नन’ बनने से ज्यादा महत्व पत्नी, प्रेमिका और मां बनने को तथा स्वाधीन स्त्री बनने को दिया। जहां मां बनना स्वाधीन व्यक्तित्व में बाधा प्रतीत हो, वहां मातृत्व से भी अधिक महत्व स्त्रीत्व को दिया। स्त्री को बाइबिल तक नहीं पढ़ने दिया जाता था तो उसके विरोध में जाग्रत स्त्रियां प्रमुख बौध्दिक और विदुषी बन कर उभरीं तथा विद्या के हर क्षेत्र में अग्रणी बनीं। क्रिश्चियन स्त्री को पुरुषों को लुभाने वाली कहा जाता था, इसीलिए नारी मुक्ति का एक महत्वपूर्ण अंग हो गया- श्रंगारहीनता या सज्जाहीनता। काम को ‘मूल पाप’ माना जाता था इसलिए उसकी प्रतिक्रिया में काम संबंध को स्वतंत्र व्यक्तित्व का लक्षण माना गया। स्त्रियां स्वयं यह सुख न ले सकें इसके लिए एक विशेष अंगच्छेदन का प्रावधान किया गया था। अत: उसके विरोध में जाग्रत स्त्रियों ने समलिंगी सम्बन्धों की स्वतंत्रता की मांग की। इन सब संदर्भों से अनजान भारतीय लोग, फिर वे प्रबुध्द स्त्रियां हों या पुरुष, यूरोपीय स्त्री मुक्ति आंदोलन के कतिपय ऊपरी रूपों की नकल करते हैं। यहां उसी क्रिश्चियनिटी का महिमामंडन किया जाता है जिसने यूरोप की स्त्रियों का उत्पीड़न सैकड़ों सालों तक किया तथा जिसने साथ ही भारत में हिन्दू धर्म और हिन्दू समाज सहित दुनिया के सभी समाजों पर अत्याचार किया।

नृशंस क्रिश्चिएनिटी के अत्याचारों के प्रतिरोध में उपजे साहित्य की नकल जब ‘अपराधी’ और ‘पीड़ित’ के इन रिश्तों की समझ के बिना ही भारत में की जाती है, तब ऐसा करने वाले लोग एक तो उन वीर स्त्रियों की पीड़ा की गहराई का अपमान करते हुए उसे भोडी नकल के योग्य कोई वस्तु बना कर अमानवीय व्यवहार करते हैं, साथ ही इसी छिछोरी मानसिकता से वे अकारण ही उस श्रेष्ठ हिंदू धर्म की निंदा करते हैं जो क्रिश्चियन साम्राज्यवादी अत्याचारों के विरुध्द भारत की स्त्रियों और पुरुषों का त्रता और रक्षक धर्म रहा है। यह हिन्दू धर्म हिन्दू स्त्री की रक्षा का समर्थ कवच रहा है। परन्तु अनपढ़ (इल्लिटरेट) लोग जो आधुनिक अर्थ में शिक्षित कहलाते हैं, इन विषयों में सत्य का विचार किए बिना यूरोपीय स्त्रियों के बाहरी शब्दों की नकल करते हुए हिन्दू स्त्रियों के कष्ट के लिए हिन्दू धर्म को ही गाली देते हैं। केवल इसलिए क्योंकि यूरोपीय नारी मुक्ति आंदोलन अत्याचारी क्रिश्चियन रेलिजन को गाली देता है। क्रिश्चियन रेलिजन का अत्याचारी इतिहास सत्य है। लेकिन उसकी नकल में हिन्दू धर्म को भी वैसा चित्रित करना पाप है, झूठी रचना है।

क्रिश्चिएनिटी की जिन मान्यताओं के विरोध में यूरोपीय नारी मुक्ति आंदोलन वीरतापूर्वक खड़ा हुआ, वे मान्यताएं हिन्दू धर्म, बौध्द धर्म तथा विश्व के सभी धर्मों में कभी थी ही नहीं। यहां तक कि यहूदी धर्म और इस्लाम में भी ये मान्यताएं कभी भी नहीं थीं। भले ही स्त्रियों पर अनेक प्रतिबंध इस्लाम में हैं परन्तु ऐसी भयंकर मान्यताएं वहां भी नहीं हैं। भारत का इतिहास तो क्रिश्चिएनिटी से नितान्त विपरीत है। यहां तो अत्यंत प्राचीन काल से स्त्रियां ब्रह्मवादिनी, रणकुशल सेनानी तथा कलाओं, शिल्पों और व्यवसाय आदि में अग्रणी रही हैं।

हिन्दू धर्म में यशश्वी स्त्रियों की महान परंपरा रही है। यहां प्राचीन काल में महारानी कैकेई से लेकर 19वीं शताब्दी ईस्वी के मधय में हुए भारत के स्वाधीनता संग्राम में सर्वसम्मति से सेनापति की भूमिका निभाने वाली युवा वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई तक हुई हैं। लक्ष्मीबाई 26 वर्षीय विधवा युवती थीं, जिन्हें युध्द सम्बन्धी उनकी दक्षता, कौशल और वीरता के कारण तत्कालीन भारतीय नरेशों ने सहज ही अपना सेनापति स्वीकार किया था। भारत में जीवन के हर क्षेत्र में वैदिक काल से ही स्त्रियां पुरुषों के समान अग्रणी रही हैं। उपनिषद कहते हैं कि एक ही मूल तत्व द्विदल अन्न के दोनों दलों की तरह स्त्री और पुरुष में विभक्त हुआ है, इसीलिए दोनों को परस्पर अर्धांग माना जाता है। भारतीय जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में दक्ष, प्रसिध्द तथा सफल स्त्रियों की अनन्त शृंखला है। यहां इस्लामी अत्याचारों और ब्रिटिश क्रिश्चियन अत्याचारों, दोनों का ही सामना स्त्रियों और पुरुषों ने समान वीरता से और सहभागिता से किया है। भारत की इस अक्षुण्ण परम्परा को अस्वीकार कर यूरोपीय नारी के इतिहास को ही भारतीय स्त्री का भी इतिहास मानने और बताने का अर्थ है स्वयं को उस ‘क्रिश्चियन’ छवि में समाहित करना जिसके अनुसार स्त्रियां सम्मोहक हैं। उनमें सेक्स की शक्ति से मोह लेने की क्षमता है। स्त्री विषयक इन ‘क्रिश्चियन’ मान्यताओं को अंगीकार करने पर उस मूल ‘क्रिश्चियन’ दृष्टि की भी सहज स्वीकृति हो जाएगी जिसके अनुसार स्त्री शैतान की बेटी और उपकरण है, ‘एडल्टरेस’ है तथा पतन का कारण है। इन सब मान्यताओं को भारतीय इतिहास का भी सत्य मानकर इनके विरुध्द विद्रोह करना भारत में नारी मुक्ति आंदोलन का लक्षण मान लिया जाता है। परन्तु क्या ऐसा झूठा, तथ्यविरुध्द और नकली इतिहास रचा जा सकता है? या मान्य हो सकता है? यूरोप की प्रबुध्द स्त्रियां ‘रेनेसां’ के बावजूद क्रिश्चिएनिटी की इन मान्यताओं के प्रभाव में हैं कि यूरोप के बाहर की दुनिया तो असभ्य लोगों और जाहिलों की दुनिया है। वे अब भी मानती हैं कि सम्पूर्ण आधुनिक विश्व के लिए एक ही सार्वभौम सभ्यता है और वह है क्रिश्चियन सभ्यता। वे इसी भाषा को समझती हैं और इसे ही बोलती हैं। यद्यपि क्रिश्चिएनिटी की सर्वश्रेष्ठता में विश्वास वो खो चुकी हैं। तथापि यूरोपीय सभ्यता की सार्वभौमिकता में उनका अभी भी विश्वास है। परन्तु भारत की प्रबुध्द स्त्री भारत के सम्पूर्ण इतिहास को झुठलाकर एक काल्पनिक इतिहास कैसे रच सकती है? और कैसे वह स्वयं को प्रमाणिक ठहरा सकेगी?

भारत में ‘नारी मुक्ति’ के मायने हैं (1)भारतीय इतिहास के विषय में तथ्यों का संकलन (2) क्रिश्चिएनिटी की भयावह मान्यताओं के रेलिजियस और दार्शनिक आधारों की सही समझ (3) उन मान्यताओं के कारण उन्मत्त ‘क्रिश्चियन’ साम्राज्यवाद द्वारा विश्वभर में किए गए बर्बर अत्याचारों और लूट की जानकारी (4) इस लूट और अपमान से हुई क्षति की पूर्ति की मांग ब्रिटेन तथा सम्पूर्ण क्रिश्चियन समाज से करना, (5) भारत से ‘एंग्लो-सेक्सन ला’ की विदाई की मांग करना। जब तक यह ‘एंग्लो-सेक्सन ला’ भारत में राज्य की विधिव्यवस्था का आधार है, तब तक भारत में हिन्दू धर्म को वैसा ही राजकीय संरक्षण दिए जाने का दबाव बनाना जैसा ‘क्रिश्चिएनिटी’ को ‘एंग्लो-सेक्सन ला’ के अंतर्गत सेक्युलर ब्रिटेन में प्राप्त है (6) भारतीय स्त्री की गौरवशाली परम्पराओं की पुनर्प्रतिष्ठा एवं (7) शासन, सेना, प्रशासन सहित विज्ञान प्रौद्योगिकी, कला, व्यवसाय आदि सभी क्षेत्रें में हिन्दू स्त्री की बुध्दि को फलवती होने देने की व्यवस्थाएं बनाने और प्रावधान किए जाने का दबाव बनाना तथा श्रेयस्कर राष्ट्र तथा श्रेयस्कर विश्व के निर्माण में हिन्दू स्त्रियों की भूमिका के लिए पथ प्रशस्त करना। यहां ‘हिन्दू स्त्री’ शब्द का प्रयोग बहुत सोच-विचार कर विवेकपूर्वक किया जा रहा है क्योंकि हिन्दू स्त्रियों का गौरवशाली इतिहास एक तथ्य है और इस सत्य के बल पर ही हिन्दू स्त्री अपनी प्रज्ञा और शील के प्रकाश तथा उत्कर्ष से स्वयं को और शिक्षित भारतीय समाज को भ्रांत धारणाओं से मुक्त रख सकती है। वह भारत की मुस्लिम और क्रिश्चियन स्त्रियों के दुख भी बांट सकती है। करुणा भाव तथा मैत्री भाव से उनकी सहायक भी बन सकती है। कम्युनिस्ट तथा अन्य यूरोख्रीस्त मत के प्रभावों वाली हिन्दू स्त्रियों की भ्रांति और विचलन को भी दूर करने में आत्मगौरव सम्पन्न हिन्दू स्त्री ही समर्थ हो सकती है। ऐसी हिन्दू स्त्री वीरता, कंटकशोधन, भारत के वैभव-विस्तार, सुसंस्कार, समृध्दि, विपुलता के प्रवाह की पोषक और संरक्षक के नाते वैविधयपूर्ण रूपों में पुन: प्रतिष्ठा पाएगी, यही भारत में नारी मुक्ति के सच्चे मायने हैं।

(लेखिका गांधी विद्या संस्थान वाराणसी की निदेशिका हैं)

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